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यादें: आखिरी बजट भाषण में प्रकाश पंत की वो 4 पंक्तियां, जो इतिहास के पन्नों में हो गईं दर्ज

Sat, 08 Jun 2019 07:47 AM IST
अलका त्यागी राकेश खंडूड़ी, अमर उजाला, देहरादून
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विधानसभा भवन में भाषण पढ़ते वित्त मंत्री प्रकाश पंत - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो
अपने आखिरी बजट भाषण में उत्तराखंड के वित्त प्रकाश पंत ने जो चार पंक्तियां कही वे अब इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गई हैं। उन्होंने कह था- ‘सूर्य हूं मैं हर एक पल जला हूं सदा/ चांद बन रात में भी चला हूं सदा/ हार के टूटने का मैं आदी नहीं/ मैं कमल कीच में भी खिला हूं सदा।’ 
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वित्त मंत्री प्रकाश पंत
ये चार पंक्तियां दर्ज हैं, प्रदेश सरकार के उस बजट अभिभाषण के आखिरी पन्ने में, जिसे प्रकाश पंत, वित्त मंत्री के तौर पर नहीं पढ़ पाए। अब ये सिर्फ इतिहास ही बन कर रह गई हैं। सदन में जब वे आधे भाषण तक पहुंचे थे तो उनके पांव लड़खड़ा गए। वे अचेत हुए तो उपस्थित सदन स्तब्ध था। जैसे-तैसे खुद संभालते वे फिर भाषण पढ़ने लगे, लेकिन काया निढाल होने लगी। उन्हें भाषण बीच में छोड़ना पड़ा। 
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वित्त मंत्री प्रकाश पंत
तब किसी ने भी नहीं सोचा था कि उनके फेफड़ों में एक ऐसा रोग दाखिल हो चुका है, जो उनके प्राणों को हर लेगा। लेकिन सच्चाई यही है कि सज्जन, मृदभाषी और कवि हृदय प्रकाश पंत अब हमारे बीच नहीं रहे। बजट भाषण में जो चार पंक्तियां उन्होंने लिखी, वे उनके व्यक्तित्व का आइना बन गई। जिन्हें उनका सानिध्य प्राप्त हुआ है, वे उनके राजनीतिक संघर्ष को जानते हैं। एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्में पंत फार्मासिस्ट से राजनीति में आए और अपनी काबलियत के दम पर संसदीय, विधायी और वित्त सरीखे मंत्रालय के मंत्री बनें। 

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वित्त मंत्री प्रकाश पंत
ये उनकी राजनीतिक शख्सियत ही थी कि बीसी खंडूड़ी, भगत सिंह कोश्यारी और डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक सरीखे दिग्गज राजनेताओं के मध्य उन्हें भी मुख्यमंत्री पद के प्रमुख और गंभीर दावेदार के तौर पर देखा गया। सत्ता हो या संगठन दोनों ही जगह पंत ने अपनी काबलियत को साबित किया।
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वित्त मंत्री प्रकाश पंत
सदन के भीतर जब-जब उनकी सरकार और मंत्रियों पर विपक्ष हमलावर हुआ तो वे ढाल बनकर सामने खड़े हो गए। मुस्कराहट उनका सबसे प्रमुख हथियार था, जिसके आगे विपक्षी अकसर हथियार डाल देते थे। 
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वित्त मंत्री प्रकाश पंत
उनकी चांद सी ठंडी मुस्कराहट जब चेहरे पर पसरती तो कई नाराजगियां और मसले हल हो जाते। चाहे वे लंबित मांगों से आंदोलन पर रहे प्रदेश के कर्मचारी ही क्यों न रहे हों। पंत की सहज और सरल बातों में कर्मचारियों की नाराजगी भी छू मंतर होती रही।
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वित्त मंत्री प्रकाश पंत
प्रदेश की सरकार, राजनीतिक दल, उनके नेता, कर्मचारी और प्रदेश की जनता के लिए पंत वीआईपी संस्कृति से जुदा एक सज्जन पुरुष थे। वे बेशक हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी सज्जनता सदैव यादों में रहेगी। उनका कमल सा खिलखिलाता चेहरा कभी नहीं भुलाया जा सकेगा।
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