आमतौर पर आमजन ने मुठभेड़ का सीन फिल्मी पर्दे पर ही देखा था। धर्मनगरी रीयल मुठभेड़ की भी गवाह बनी। यकायक गोलियों की आवाज से पूरा इलाका गूंज उठा। आम लोग दहशत में आ गए थे।
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रोजाना की तरह हरिद्वार तहसील के पास रौनक थी पर तभी ऐसा कुछ हुआ कि हर कोई भौचक्का सा रह गया। एक स्विफ्ट कार को घेर रही तीन अलग अलग कारों में सवार लोगों ने जब फायरिंग शुरू की तब हर कोई अवाक रह गया। कोई अपनी दुकान के अंदर छिपकर ही नजारा देखता रहा तो किसी के कदम जहां के तहां ठिठक गए। इसी दौरान तेजी में स्विफ्ट कार रामनगर कालोनी के अंदर घुस गई, एक स्कूटर सवार बुजुर्गवार चपेट में भी आ गए। कई राउंड हुई फायरिंग का जब शोर थमा तब आमजन भी पीछे पीछे रामनगर कालोनी की तरफ दौड़ पड़े।
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दो युवकों पर काबू पाया जा चुका था, तीसरे को एक घर से दबोचा गया। जब गाजियाबाद क्राइम ब्रांच ने अपना परिचय दिया तब उन्हें घेर चुके आमजन की जिज्ञासा शांत हुई। हर कोई यही बोलता दिखा कि आज तक फिल्मी मुठभेड़ जरूर देखी थी लेकिन रीयल मुठभेड़ भी देखने को मिली। रामनगर के युवाओं ने घर में घुसे बदमाश मोहसीन को बुरी तरह से पीटा। यूपी पुलिस को भी आमजन को समझाने में काफी मशक्कत करनी पड़ी। योगी राज में यूपी पुलिस के हाथ कितने खुले है इसका अंदाजा हरिद्वार में आकर मुठभेड़ को अंजाम देने से जाहिर हो जाता है। यूपी पुलिस के हौसले बेहद बुलंद है, इसलिए उन्होंने स्थानीय पुलिस का सहयोग लेना भी जरूरी नहीं समझा। ऑपरेशन को अंजाम देकर अपना टारगेट भी छू लिया, जब स्थानीय पुलिस पहुंची तब यूपी पुलिस के जवान पूरे ऑपरेशन को अंजाम दे चुके थे।
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यूपी में अपराधियों की शामत आई हुई है। एक-एक कर मुठभेड़ में अपराधियों का सफाया करने में यूपी पुलिस जुटी है। बताया जाता है कि गाजियाबाद के उद्यमी अनिल अरोड़ा के अपहरणकांड को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, डीजीपी ओपी सिंह ने भी गंभीरता से लिया हुआ था। ऊपर से साफ आदेश था कि, हर हाल में उद्यमी जिंदा चाहिए। चाहे अपहरणकर्ता क्यों न मारे जाएं। यही वजह थी कि यूपी पुलिस ने दूसरे शहर में भी मुठभेड़ को अंजाम दे डाला। गनीमत रही कि कोई आमजन हताहत नहीं हुआ। इसका खुलासा भी टीम की अगुवाई कर रहे क्राइम ब्रांच के इंस्पेक्टर दिनेश यादव ने खुद पुलिस अधिकारियों के समक्ष किया। बोला कि, दो दिन से डीजीपी खुद सीधे संपर्क कर पल पल की रिपोर्ट ले रहे थे।
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यूपी पुलिस को पिछले 48 घंटे तक नौसीखिए अपहरणकर्ता छका रहे थे। वे बार बार अपनी लोकेशन भले ही बदल रहे थे, लेकिन ये नहीं जानते समझते थे यूपी पुलिस उनके पीछे पीछे ही है। हर छह घंटे के अंतराल में फिरौती की डिमांड कर अपनी मौजूदगी का अहसास करा रहे थे। इलेक्ट्रानिक्स सर्विलांस की बदौलत ही गाजियाबाद क्राइम ब्रांच इनके गिरेबां तक पहुंच पाई।
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अपहरणकांड का मुख्य साजिशकर्ता राशिद से उद्यमी अनिल अरोड़ा की जान पहचान थी। इसलिए उसके मोबाइल फोन नंबर से फिरौती की डिमांड नहीं की जा रही थी। दूसरे अपहरणकर्ता प्रदीप के मोबाइल फोन का इस्तेमाल हो रहा था। हालांकि, प्रदीप ने अपनी आईडी पर सिम कार्ड नहीं खरीदा था। उसके मोबाइल फोन के आईएमईएमआई नंबर से पुलिस उसकी पहचान कर चुकी थी। पिछले 48 घंटे तक अपहरणकर्ताओं की लोकेशन वेस्ट यूपी और हरियाणा के अलग अलग जिलों में ही आ रही थी। वे एक जगह पर ठहर नहीं रहे थे और हर छह घंटे में मोबाइल फोन का स्विच ऑन कर फिरौती की डिमांड कर रहे थे। इधर, केवल लोकेशन के आधार पर यूपी पुलिस अपहरणकर्ताओं का पीछा कर रही थी। आखिर जब हरिद्वार पहुंचकर मोबाइल फोन ऑन कर कॉल की गई तब यूपी पुलिस ने उन्हें ट्रेस कर लिया। अपहरणकर्ताओं के अनाड़ीपन ने ही यूपी क्राइम ब्रांच की राह आसान कर दी थी, वे उद्यमी को लेकर यहां से वहां भटक रहे थे। उद्यमी के परिजन भी बार बार फिरौती की रकम का इंतजाम करने की बात कहकर उन्हें टहला रहे थे। उन्हें शायद दूर दूर यह इल्म नहीं था कि यूपी पुलिस उनसे चंद कदम की ही दूरी पर है।
उद्यमी को नशे के इंजेक्शन लगाए जा रहे थे। क्राइम ब्रांच ने जब यूपी को बंधन मुक्त कराया तब वह पूरी तरह से होश में नहीं थे। उद्यमी ने ही बताया कि, फिरौती की डिमांड करने के साथ ही उन्हें नशे का इंजेक्शन लगा दिया गया था। वे जैसे ही होश में आते थे, उन्हें फिर इंजेक् शन लगा दिया जाता था। हां, खाना भी खिलाया गया था। उद्यमी को यह याद है कि उनका अपहरण शुक्रवार की रात को हुआ। उद्यमी अपहरणकांड के पीछे आखिर कोई बड़ा गैंग तो नहीं है, इसकी तस्वीर अभी पूरी तरह से साफ नहीं हुई है। यूपी पुलिस का भी यही कहना था कि अपराधियों से पूछताछ के बाद ही इसकी पटकथा साफ हो सकेगी। यूपी पुलिस जब ऑपरेशन को अंजाम दे रही थी तब उत्तराखंड की सीपीयू (सिटी पेट्रोलिंग यूनिट) उसकी वीडियोग्राफी करने में व्यस्त थी। सीपीयू की इस कार्यशैली से आहत क्राइम ब्रांच के इंस्पेक्टर दिनेश यादव ने स्थानीय अधिकारियों से शिकायत भी की।