हिंदुओं के पवित्र धाम बदरीनाथ का वर्णन वेदों में मिलता है। यह धाम उत्तराखंड स्थित नारायण पर्वत पर मौजूद है। 17 नवंबर को बदरीनाथ धाम के कपाट शीतकाल के लिए बंद हो जाएंगे। पढ़िए धाम के बारे में दस अनकहे सच...
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इन दस तस्वीरों में जानें बदरीनाथ धाम की अनकही कहानी
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जिस धाम में भगवान विष्णु के दर्शन के लिए हर साल लाखों लोग दर्शन के लिए आते हैं उस बदरीनाथ धाम का कोई ऐतिहासिक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। हां, लेकिन वेदों में बदरीनाथ धाम का वर्णन है।
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यह मंदिर उत्तराखंड के चमोली जिले में नारायण पर्वत पर अलकनंदा नदी की गोद में स्थित है। जहां गर्म पानी का कुंड (तप्त कुंड) है। इसमें स्नान कर श्रद्घालु सफर की थकान से मुक्ति पाते हैं और भगवान बदरी के दर्शन करते हैं।
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बताया जाता है कि बदरीनाथ का यह मंदिर आज जिस स्वरूप में हैं पहले ऐसा नहीं था। राजा अशोका के शासन के दौरान यहां बौद्घ मंदिर हुआ करता था।
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उधर, स्कंद पुराण के मुताबिक आदी गुरु शंकराचार्य ने नारद कुंड से भगवान बदरीनाथ की मूर्ति प्राप्त की थी। मूर्ति को आठवीं सदी में इस मंदिर में पुनः स्थापित किया गया।
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धाम में भगवान बदरीनाथ (श्री विष्णु) की मूर्ति काले पत्थर शालीग्राम से बनी हुई है और पदमासन में विराजमान है।
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मान्यता है कि धाम में स्थित मूर्ति कभी ब्रह्मा, विष्णु, महेश, हनुमान, काली और गुरु के साथ उस रूप में दिखाई देती है जैसा भक्त उसे देखना चाहते हैं।
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धाम को तीन भागों में बांटा गया है। पहला गृह गर्भ, यहां भगवान बदरी की मूर्ति स्थापित की गई है। दूसरा दर्शन मंडप, यहां पूजा कार्यक्रम किया जाता है। तीसरा सभा मंडप, यहां भक्त भगवान के दर्शनों का इतंजार करते हैं।
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धाम में नर-नारायण विग्रह की पूजा होती है और अखंड दीप जलता है। यह भारत के चार धामों में प्रमुख तीर्थ-स्थल है। प्रत्येक हिन्दू की यह कामना होती है कि वह बदरीनाथ के दर्शन जीवन में एक बार अवश्य करे।