भगवान नारायण के धाम बदरीनाथ धाम के बारे में हम आपको ऐसी बातें बता रहे हैं जो हर श्रद्धालु को जाननी चाहिए...
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badrinath dham
- फोटो : amar ujala
जिस धाम में भगवान विष्णु के दर्शन के लिए हर साल लाखों लोग दर्शन के लिए आते हैं उस बदरीनाथ धाम का कोई ऐतिहासिक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। हां, लेकिन वेदों में बदरीनाथ धाम का वर्णन है।
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badrinath
यह मंदिर उत्तराखंड के चमोली जिले में नारायण पर्वत पर अलकनंदा नदी की गोद में स्थित है। जहां गर्म पानी का कुंड (तप्त कुंड) है। इसमें स्नान कर श्रद्घालु सफर की थकान से मुक्ति पाते हैं और भगवान बदरी के दर्शन करते हैं।
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badrinath temple
- फोटो : file photo
बताया जाता है कि बदरीनाथ का यह मंदिर आज जिस स्वरूप में हैं पहले ऐसा नहीं था। राजा अशोका के शासन के दौरान यहां बौद्घ मंदिर हुआ करता था।
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बदरीनाथ
- फोटो : google
उधर, स्कंद पुराण के मुताबिक आदी गुरु शंकराचार्य ने नारद कुंड से भगवान बदरीनाथ की मूर्ति प्राप्त की थी। मूर्ति को आठवीं सदी में इस मंदिर में पुनः स्थापित किया गया।
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badrinath
- फोटो : amarujala
धाम में भगवान बदरीनाथ (श्री विष्णु) की मूर्ति काले पत्थर शालीग्राम से बनी हुई है और पदमासन में विराजमान है। मान्यता है कि धाम में स्थित मूर्ति कभी ब्रह्मा, विष्णु, महेश, हनुमान, काली और गुरु के साथ उस रूप में दिखाई देती है जैसा भक्त उसे देखना चाहते हैं।
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badrinath
- फोटो : amarujala
धाम को तीन भागों में बांटा गया है। पहला गृह गर्भ, यहां भगवान बदरी की मूर्ति स्थापित की गई है। दूसरा दर्शन मंडप, यहां पूजा कार्यक्रम किया जाता है। तीसरा सभा मंडप, यहां भक्त भगवान के दर्शनों का इतंजार करते हैं।
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badrinath
धाम में नर-नारायण विग्रह की पूजा होती है और अखंड दीप जलता है। यह भारत के चार धामों में प्रमुख तीर्थ-स्थल है। प्रत्येक हिन्दू की यह कामना होती है कि वह बदरीनाथ के दर्शन जीवन में एक बार अवश्य करे।
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बदरीनाथ
- फोटो : google
बदरीनाथ मंदिर में वनतुलसी की माला, चने की कच्ची दाल, गिरी का गोला और मिश्री आदि का प्रसाद चढ़ाया जाता है। कपाट बंद होने और खुलने के दौरान यही भोग लगाया जाता है।
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badrinath aarti
बदरीनाथ धाम की आरती एक मुस्लिम ने लिखी है। आज से 152 साल पहले यह आरती बदरुद्दीन ने लिखी जिससे आज भी धाम में पूजा होती है।
बदरीनाथ धाम के कपाट बंद होने और खुलने के दिन रावल साड़ी पहन कर पार्वती का श्रृंगार करके ही गर्भगृह में प्रवेश करते हैं। मंदिर के रावल सखी बनकर लक्ष्मी मंदिर में जाते हैं। मान्यता यह कि उद्धव ही कृष्ण के बाल सखा है और उम्र में बड़े, इसलिए लक्ष्मी जी के जेठ हुए। हिन्दू परंपरा के अनुसार जेठ के सामने बहू नहीं आती है। इसलिए पहले जेठ बाहर आयेंगे तब लक्ष्मी को विराजा जाएगा।