वैसे तो टीवी को 'बुद्घू बक्सा' कहा जाता है, लेकिन इस बक्से ने उत्तराखंड के इन भाईयों की जिदंगी की 'पिक्चर' चमका दी है। यहां बात हो रही है उस टीवी मेकेनिक पिता की मेहनत और उसके हुनर की, जिसने खराब टीवी ठीक करते-करते अपने चार बच्चों की जिंदगी की ‘पिक्चर’ ऐसी संवारी कि आज जब भी वह पिता अतीत में झांककर वर्तमान में लौटता है तो खुशी के आंसू छलक जाते हैं। आंसुओं से झिममिल आंखें और लबों पर मुस्कान के साथ मोहम्मद इशहाक कहते हैं कि मैं कुछ नहीं बन सका, लेकिन मैं अपने जैसी जिंदगी अपने बच्चों के लिए कभी नहीं चाहता था।
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देखिए कैसे, 'बुद्घू बक्से' ने संवार दी इन भाईयों की ‘पिक्चर’
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सालों की मेहनत के बाद आज खुदा का शुक्रिया अदा करता हूं कि उसके रहम से मैं अपने बच्चों को सही जगह पहुंचा सका। मोहम्मद इशहाक के पांच बच्चों में एक बेटा लेफ्टिनेंट है और तीन बेटे इंजीनियर, जबकि एक बेटी अभी पढ़ाई कर रही है। यही नहीं उनके बच्चे भी फख्र से कहते हैं कि हम खुशनसीब हैं कि माता-पिता के सपने को जीने का मौका मिला। आज से करीब 40 साल पहले पैतृक गांव देवरनियां मुडिया जिला (बरेली) छोड़कर सितारगंज आए ग्रेजुएट मो. इशहाक ने शहर में वीनस रेडियोज के नाम से एक दुकान खोली। मेहनत और हुनर ने उन्हें क्षेत्र में एक मशहूर मेकेनिक बना दिया। मो. इशहाक की पत्नी मेहर बानो हाईस्कूल तक उर्दू मोअल्लिम हैं। दोनों का घर पांच बच्चों से गुलजार हुआ और शुरू से ही दंपति से ठान ली कि अपने बच्चों को सही मुकाम पर पहुंचाना है।
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मेहर बानो बताती हैं कि हमने शुरू से ही तय कर रखा था कि चाहे कितनी भी
मुश्किलें आ जाएं लेकिन बच्चों को बेहतर शिक्षा जरूर देंगे और आज बस खुदा
का शुक्रिया ही अदा करते हैं। मो. इशहाक बताते हैं कि टीवी ठीक कर-करके जो
भी कमाया वो सब बच्चों की पढ़ाई और जिंदगी संवारने में ही लगाया। उनके बड़े
तीन बेटे मो. जुनेद, मो. उबैद और मो. शोएब ने इन्फॉरमेशन टेक्नोलॉजी ट्रेड
से इंजीनियरिंग की और प्राइवेट सेक्टर में नौकरी कर रहे हैं।
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सबसे छोटे बेटे मो. नावेद ने बेसिक शिक्षा शहर के शैली स्कूल से ग्रहण करने के बाद जामिया मिलिया इस्लामिया कॉलेज (दिल्ली) से हाईस्कूल और इंटर की शिक्षा ली और 2011 में ओटीए गया (बिहार) में एक साल की बेसिक मिलिट्री ट्रेनिंग की। इसके बाद 2012 से सिकंदराबाद के मिलिट्री कॉलेज ऑफ इलेक्ट्रॉनिक्स एंड मेकेनिकल (एमसीईएमई) के कैडेट ट्रेनिंग विंग में तीन साल टेक्निकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। 13 जून 2015 को पासआउट होने के बाद अब एमसीईएमई सिकंदराबाद में लेफ्टीनेंट के पद पर कार्यरत है।
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मेहर बानो का कहना है कि अब उनकी अगली जिम्मेदारी उनकी बेटी शीरीन फातिमा है, जो शैली स्कूल में कक्षा नौ की छात्रा है। मेहर कहती हैं कि वह बेटी को आईएएस बनाना चाहती हैं। लेफ्टीनेंट बनने के बाद पहली बार छुट्टी पर घर आए मो. नावेद ने अमर उजाला से बातचीत में अपनी सफलता के लिए माता-पिता और शिक्षकों को प्रेरणादायी बताया। उन्होंने नौजवानों को संदेश देते हुए कहा कि इंजीनियरिंग और डॉक्टरी साथ ही अपना रुझान आर्मी में भी रखें।
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देश की सुरक्षा के लिए नौजवानों को आगे आना चाहिए। मो. नावेद कहते हैं अम्मी-अब्बू के सपने को जीना हम सभी भाई-बहनों के लिए गर्व की बात है, क्योंकि अपने सपने तो हर कोई जीने की सोचता है, मां-बाप के सपने को जीने में अलग ही सुकून है। पहली बार लेफ्टीनेंट नावेद के घर आने पर बधाई देने वालों का भी तांता लगा रहा। (स्टोरीः मो. यामीन अंसारी/ अमर उजाला, सितारगंज)