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कांवड़ यात्रा 2018: तो इसलिए हर साल उठाई जाती है कांवड़, इसके पीछे है मां गंगा को दिया एक वचन

Tue, 07 Aug 2018 09:43 AM IST
कौशल सिखौला , अमर उजाला, हरिद्वार
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kanwar - फोटो : amar ujala
भगवान विष्णु के अवतार परशुराम ने विश्व दिग्विजय करने के बाद हरिद्वार में हर की पैड़ी से त्रेता युग में पहली कांवड़ उठाई थी।
 
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पतित पावनी को दिया वचन निभाने परशुराम अब भी हरिद्वार से कांवड़ उठाते हैं। बागपत के पुरामहादेव में आज भी पहली कांवड़ ब्रह्मर्षि परशुराम द्वारा ही चढ़ाई जाती है। उन्होंने ही गंगा से उनके शिलाखंड सहित देश के विभिन्न भागों में शिवलिंगों की स्थापना कराई थी।  
 
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परशुराम दिग्विजय यात्रा के बाद मयराष्ट्र के भूभाग पर पहुंचे जहां उन्होंने भगवान शिव के लिए महारुद्र यज्ञ का आयोजन किया। यज्ञ के लिए शिवलिंग के रूप में स्थापना करने के लिए वे हरिद्वार की हर की पैड़ी पहुंचे। परशुराम ने अपने साथ आए ऋषियों के साथ गंगा से शिवलिंग की स्थापना के लिए पाषाण निकालना शुरू कर दिया। बाहर आते ही मां के बिछड़ने के दर्द में गंगा के शिलाखंड करुण क्रंदन करने लगे। परशुराम की प्रार्थना पर मां गंगा स्त्री रूप धारण कर प्रकट हुईं।

 

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तब परशुराम ने भगवती गंगा से कहा कि वे इन शिलाखंडों को पुरा सहित देश के अन्य क्षेत्रों में स्थापित करेंगे। ये पाषाण निश्चिंत रहें, प्रत्येक सावन में जब भगवान शिव कनखल आएंगे, तब देशवासी गंगाजल ले जाकर इन पाषाणों से गंगा का मिलन कराएंगे। शिव का यह श्रावणी जलाभिषेक पूरे संसार को शांति प्रदान करेगा। प्रख्यात इतिहासकार डॉ. डीआर शर्मा विद्यावास्चपति तथा स्कंद पुराण के अनुसार तब से कांवड़ यात्रा शुरू हुई। श्रावण में पहली कांवड़ परशुराम उठाते हैं और पुरामहादेव में चढ़ाते भी वहीं हैं। करोड़ों देशवासी परशुराम का अनुसरण करते हुए हर की पैड़ी से देश में पैदल यात्रा लेकर कांवड़ चढ़ाने जाते हैं।  
 
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श्रावण ही नहीं फागुन में महाशिवरात्रि पर भी कांवड़ यात्रा निकलनी प्रारंभ हो गई। देश के विभिन्न शिवालयों के लिए कई महायात्राएं श्रावण में निकलती हैं। तभी से देश के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में भगवान आशुतोष के जलाभिषेक का सिलसिला शुरू हुआ। डॉ. विद्यावाचस्पति के अनुसार कलयुग में परशुराम अमूर्त रूप में ऋषियों के साथ कांवड़ भरते आते हैं। उनके साथ आएं ऋषि देश के अनेक ज्योतिर्लिंगों और शिवालायों में गंगा जल चढ़ाते हैं।  
 
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त्रेता में पुरा महादेव का नाम परशुरामेश्वर महादेव था। तब महर्षि वाल्मीकि ने परशुराम की प्रार्थना पर हरिद्वार से ले जाए गए पाषाण को शिवलिंग के रूप में स्थापित कर प्राण प्रतिष्ठा कराई। पौराणिक आख्यानों के अनुसार, हर की पैड़ी का ब्रह्मकुंड नाम ब्रह्मणस्पति परशुराम के नाम पर ही पड़ा। जिस स्थल से परशुराम और ऋषियों शिव पर चढ़ाने के लिए गंगा जलभरा था, वह स्थल ब्रह्मकुंड नाम से जाना गया। हर की पैड़ी और ब्रह्मकुंड तभी से एक स्थल पर विद्यमान हैं।
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