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6 साल पहले आज ही निर्भया कांड से दहला था देश, अंदर तक हिला देगा उसके आखिरी पलों का सच

Sun, 16 Dec 2018 10:16 AM IST
अलका त्यागी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
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nirbhaya case
16 दिसंबर 2012 की सर्द रात को हुए उस जघन्य कांड को सहने वाली निर्भया का दर्द आज भी कोई नहीं भूला है। छह साल पहले आज ही दरिंदों ने निर्भया की आबरू को तार-तार कर उसे मौत के दरवाजे तक पहुंचा दिया था। जब निर्भया जिंदगी से हार गई तो उसने अपने आखिरी पलों में मां से जो बातें की वो आपको भी अंदर तक हिला देंगी।
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nirbhaya
निर्भया देहरादून के इंस्टीट्यूट से पढ़ाई कर रही थी। उसकी सहेलियां आज भी उसे याद कर रोती हैं। निर्भया की कहानी हर इंसान को अंदर तक झकझोरने वाली है। यहां तक कि उसका इलाज करने वाले डॉक्टर भी अंदर तक हिल गए। उस दिन निर्भया के साथ जो हुआ वह कभी किसी के साथ न हो अब इसकी बस दुआ की जा सकती है।
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nirbhaya mother
उस हादसे के बाद दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में निर्भया जिंदगी की जंग लड़ रही थी। वह इस हालत में नहीं थी कि किसी से कुछ भी कह सके। ऐसे में वह अपनी बात अपनी मां से कागज पर लिखकर बताती थी।

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वह कहती थी कि मां मुझे बहुत दर्द हो रहा है। मैने आपसे और पापा से फिजियोथेरेपिस्ट बनकर लोगों के दुख को दूर करने का वादा किया था। लेकिन आज मुझसे अपना ही दुख बर्दाश्त नहीं हो रहा है।
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nirbhaya juvenile
कहा कि मां मैं सांस भी नहीं ले पा रही हूं। जब भी मैं आंखें बंद करती हूं तो लगता है कि मैं बहुत सारे दरिंदों के बीच फंसी हूं। वो दरिंदे मेरे शरीर को नोच रहे हैं।
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Nirbhaya Rape Case
ये मुझे बुरी तरह से रौंद डालना चाहते हैं। मैं अब अपनी आंखें बंद नहीं करना चाहती हूं, लेकिन डर के कारण नहीं कर पा रही हूं। मेरे शरीर में इतनी शक्ति नहीं है की मैं सिर उठाकर आईसीयू से बाहर खड़े अपनों को देख सकूं। मां आप मुझे छोड़कर मत जाना। अकेले में मुझे बहुत डर लगता है। मैं आपको तलाशने लगती हूं
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nirbhaya gangrape
कहा कि मां आईसीयू की सारी मशीनों से भी मुझे डर लगता है। मुझे उस ट्रैफिक सिग्नल की याद आती है जहां ये सब हुआ। अपनी मां से अपने दर्द और पीड़ा को बयां करती निर्भया बस एक ही गुहार लगाती थी कि उन्हें सजा दिला दो। वह जीना चाहती थी। लेकिन डर उसके अंदर इस कदर घर कर गया था कि वह जीने से भी डरने लगी, और अंत में जब वह नहीं लड़ सकी तो एक ही बात कही और हमेशा के लिए सो गई। 'मां मुझे माफ कर देना। अब मैं जिंदगी से और लड़ाई नहीं लड़ सकती।'
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