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शिक्षा की अलख: टीचर फॉर इंडिया, फिर दलाईलामा फेलोशिप, अब राष्ट्रमंडल पुरस्कार... श्रुतिका की दिलचस्प कहानी

Mon, 31 Jul 2023 02:23 PM IST
रेनू सकलानी नीरज मिश्रा, अमर उजाला ब्यूरो, देहरादून
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श्रुतिका - फोटो : amar ujala

टिहरी की श्रुतिका ने दिल्ली में उच्च शिक्षा के दौरान शिक्षा के क्षेत्र में कुछ अलग करने की ठानी और दो साल में उनका चयन राष्ट्रमंडल युवा पुरस्कार के लिए हो गया। उनका चयन राष्ट्रमंडल देशों के कुल 50 युवाओं में किया गया है, जिसमें चार भारतीय शामिल हैं। सितंबर में उन्हें लंदन में यह पुरस्कार दिया जाएगा।

श्रुतिका सिंपल फाउंडेशन के साथ टिहरी गढ़वाल में शिक्षा के सुधार पर काम कर रही हैं। वह फाउंडेशन की एसोसिएट डायरेक्टर हैं। फिलहाल वह पांच स्कूलों में अपना प्रोजेक्ट चला रही हैं, लेकिन उनका सपना देशभर के सरकारी स्कूलों में गुणात्मक सुधार पर है। इसके लिए उन्होंने कुछ प्रोजेक्ट बनाएं हैं जो बच्चों को भावनात्मक रूप से काफी मजबूत बनाते हैं।

उन्हें इससे पहले भी टीचर फॉर इंडिया और दलाईलामा फेलोशिप मिल चुकी है। मूल रूप से टिहरी के कखीलभेलधार की रहने वाली श्रुतिका के पिता विनोद सिलस्वाल एमआईटी कॉलेज ढालवाला में जबकि मां मीनाक्षी चंबा के जीआईसी नागणी में शिक्षिका हैं। श्रुतिका कोविड के बाद शिक्षा के लिए पहाड़ से होने वाले पलायन से आहत हैं और वह नहीं चाहतीं कि कोई प्राथमिक शिक्षा के लिए अपना घर छोड़कर दूसरे शहर जाए। 

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टिहरी में स्कूल में पढ़ते बच्चे - फोटो : अमर उजाला

सवाल : अपने प्रोजेक्ट के बारे में बताएं ?

- जी, मैं सिंपल फाउंडेशन के साथ काम कर रही हूं। हमारे तीन प्रोग्राम्स हैं, जो जिला प्रशासन के साथ मिलकर पांच प्राथमिक स्कूलों में चल रहे हैं। हमारा जोर मिक्स लर्निंग पर है। इन स्कूलों में पहली और दूसरी के बच्चे एक साथ और तीसरी से पांचवीं के बच्चे एक साथ बैठते हैं। हम लोग बच्चों के साथ-साथ शिक्षकों के साथ भी काम करते हैं। हमने शिक्षकों के लिए निपुण भारत के तहत प्रोग्राम्स बनाए हैं। उन्हें हम प्रैक्टिस कराते हैं। हमारा उद्देश्य है कि बच्चों को तीन तरीके से शिक्षा मिले। पहला, उनका शैक्षणिक स्तर अच्छा हो, दूसरा उनका सामाजिक और भावनात्मक विकास हो और तीसरा 21वीं सदी की स्किल्स के हिसाब से उनमें क्रिटिकल थिंकिंग विकसित हो। इसमें शिक्षा महानिदेशक बंशीधर तिवारी का काफी सहयोग मिलता है।

सवाल : टिहरी में किस तरीके से परिणाम सामने आ रहे हैं ?

पहला तो यह है कि जो टीचर्स हैं, उनमें काफी खुलापन है। हम उनके साथ बहुत क्लोजली ग्राउंड पर काम करते हैं। हमने ये भी देखा है कि जब बच्चा अपने आसपास की चीजों को सोच पाता है और उसे विजुलाइज करता है तब उसकी लर्निंग ज्यादा मजबूत होती है। इससे काफी अच्छा रिस्पांस मिलता है। हम स्कूल के अंदर बच्चों के साथ भावनात्मक लगाव के लिए प्रैक्टिस करते हैं। हर दिन सुबह बच्चों से शिक्षक बात करते हैं कि वे कैसा महसूस कर रहे हैं, उन्होंने आज क्या खाया। क्या आज वह ठीक से सो पाए या नहीं। क्या उसके घर में कोई समस्या तो नहीं। इस तरह की बातें बच्चों को प्रभावित करती हैं और उन्हें लगता है कि कोई उनकी भी सुन रहा है। ऐसे में अच्छे परिणाम सामने आ रहे हैं।

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टिहरी में स्कूल में पढ़ते बच्चे - फोटो : अमर उजाला

सवाल : ओमान और दिल्ली में पढ़ाई करने के बाद टिहरी वापस कैसे पहुंचीं ?

-मैं दिल्ली में पढ़ाई कर रही थी। इस बीच मैं यूथ एलाइंस संस्था के साथ वालंटियर के रूप में काम कर रही थी। बीकॉम खत्म होने के बाद मुझे सीए की तैयारी शुरू करनी थी, लेकिन मेरा मन सामाजिक कार्यों में लग रहा था। कोविड के दौरान मैं अलग-अलग क्षेत्रों में काम कर रही थी। इस दौरान उत्तराखंड से काफी संख्या में लोग पलायन करके दूसरे शहरों में जा रहे थे। मैंने अनेक लोगों से बात की, सबसे ज्यादा समस्या बच्चों की शिक्षा की थी। इसके अलावा मेरी मम्मी गांव में शिक्षिका हैं, तो गांव का अनुभव था। तभी मुझे लगा कि वापस गांव जाना चाहिए और लोगों के लिए कुछ करना चाहिए। इसके बाद मैंने सिंपल फाउंडेशन से संपर्क किया और हम एक दूसरे के साथ काम करने लगे।

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टिहरी में स्कूल में पढ़ते बच्चे - फोटो : अमर उजाला

राष्ट्रमंडल पुरस्कार के लिए चयन कैसे हुआ ?

- मुझे दिल्ली में टीचर फॉर इंडिया फेलोशिप मिली थी। मैंने दो साल तक बच्चों के लिए काम किया। इसके बाद मैं सिंपल फाउंडेशन से जुड़ी। इसी बीच मेरी संस्था ने मुझसे कहा कि आपको राष्ट्रमंडल पुरस्कार के लिए नामांकन करना चाहिए। हमने कुछ वीडियोज और फोटोज समेत अन्य जानकारियां भेजीं और जो भी जरूरी प्रक्रिया थी, उसे पूरा किया। गत माह मुझे ई-मेल पर बताया गया कि मेरा चयन हो गया है। हालांकि इसकी घोषणा अभी हुई है। अब सितंबर में मुझे लंदन में अवॉर्ड मिलेगा। मेरी एक साल की दलाईलामा फेलोशिप भी पूरी हो रही है। मैं 15 अगस्त को देहरादून आ रही हूं। इसके बाद फिर फाउंडेशन के काम में लग जाऊंगी।

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टिहरी में स्कूल में पढ़ते बच्चे - फोटो : अमर उजाला

पहले टीचर फॉर इंडिया फेलोशिप, फिर दलाईलामा फेलोशिप और अब राष्ट्रमंडल पुरस्कार, आगे की क्या योजना है ?

- अभी उत्तराखंड के सरकारी स्कूलों की स्थिति सुधारने पर काम करना है। इसके बाद हमारी कोशिश है कि देश के अन्य राज्यों में भी शिक्षा के प्रोजेक्ट को लागू करें।

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