पिंडदान के लिए गया भले ही सबसे अधिक प्रसिद्ध हो लेकिन उत्तराखंड के इस तीर्थ में पिंडदान गया से भी आठ गुणा फलदायी है। जानिए इस तीर्थ के बारे में...
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गया से भी आठ गुना फलदायी है इस तीर्थ में पिंडदान, तस्वीरें
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बदरीनाथ धाम से 150 मीटर की दूरी पर तप्तकुंड के समीप अलकनंदा नदी के किनारे पर ब्रह्मकपाल स्थित है। मान्यता है कि यहां पर पिंडदान करने से पितरों की आत्मा को नरकलोक से मुक्ति मिल जाती है। स्कंद पुराण में ब्रह्मकपाल को गया से आठ गुणा अधिक फलदायी पितरकारक तीर्थ कहा गया है।
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श्राद्घ पक्ष शुरू होते ही बदरीनाथ धाम में स्थित ब्रह्म कपाल में पितर तर्पण के लिए तीर्थयात्रियों का उमड़ना शुरू हो गया है। सोमवार को 432 तीर्थयात्रियों ने ब्रह्म कपाल में अपने पितरों का तर्पण किया। यही वह तीर्थ है जहां पर ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त होने के लिए शिव जी को भी आना पड़ा था।
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बदरीनाथ के धर्माधिकारी भुवन चंद्र उनियाल का कहना है कि केदारखंड में वर्णित है कि ब्रह्म कपाल में चावल का एक छोटा हिस्सा भी पिंड के रूप में दिया जाए तो उसकी सात पीढ़ियों का उद्घार हो जाता है। कहा जाता है कि ब्रह्मा की हत्या के पाप से मुक्त होने के लिए शिव को भी यहां आना पड़ा था।
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कहा जाता है कि एक बार ब्रह्मा मां सरस्वती के रुप पर मोहित हो गए। जिसपर भोलेनाथ ने गुस्से में आकर ब्रह्मा के एक सिर को त्रिशूल से काट दिया। लेकिन सिर त्रिशूल पर ही चिपक गया।
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ब्रह्मा की हत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए जब भोलेनाथ पृथ्वी लोक के भ्रमण पर गए तो बदरीनाथ से पांच सौ मीटर की दूरी पर त्रिशूल से ब्रह्मा का सिर जमीन पर गिर गया तभी से यह स्थान ब्रह्मकपाल के रुप में प्रसिद्ध हुआ।
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यही नहीं जब महाभारत के युद्ध में पांडवों ने अपने ही बंधु-बांधवों को मार कर विजय प्राप्त की थी तब उन पर गौत्र हत्या का पाप लगा था। गौत्र हत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए स्वर्ग की ओर जा रहे पांडवों ने भी इसी स्थान पर अपने पितरों को तर्पण दिया था।
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कहते हैं कि श्राद्ध पक्ष में ब्रह्मकपाल में पितर तर्पण करने से वंश वृद्धि होती है। दिल्ली के मयंक त्रिपाठी का कहना है कि वे पिछले पांच साल से अपने पिता के तर्पण के लिए बदरीनाथ धाम आने का कार्यक्रम बना रहे थे, इस वर्ष धाम में आने का संयोग बना है। धाम में तर्पण करने से मन को सुकून मिल रहा है।