वर्ष 2013 में भगवान शिव के इस धाम में आई जल प्रलय के खौफनाक मंजर जिसने भी देखा सहम उठा। देखते ही देखते पल भर में सब कुछ तबाह हो गया। कुछ यात्री आपदा में मौत की नींद सो गए। तो कुछ बच गए।
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कईं यात्रियों ने इस भयावह मंजर को अपनी आंखो से देखा। लेकिन जिंदगी को बचाने की जद्दोजहद में वे इस वजह से अपनी जान गंवा बैठे।
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तमाम लोगों के बारे में कुछ पता नहीं लगा कि आखिर वे भागकर कहां पर गए? लेकिन ऐसे लोगों के बारे में स्थानीय लोगों का मनना था कि लोग अपनी जान बचाने के लिए ऊपर पहाड़ों पर चले गए।
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इस दौरान उनके पास खाने को कुछ नहीं था। अपनी जान बचाने के लिए घास खाने का फैसला किया लेकिन उनको नहीं पता था कि जो घास वे खा रहे हैं ज़हरीली है। इस कारण से भी कुछ लोगों की मौत हो गई।
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उस समय मृतकों की संख्या का पता लगाना बहुत कठिन था। चार साल बीतने के बाद भी मरने वाले यात्रियों की सही संख्या नहीं लग पाई है।
बता दें कि उत्तराखंड में कई तरह की घास उगती है जो काफी लाभदायक भी होती है। लेकिन उच्च हिमालयी क्षेत्रों में बिच्छु घास आदि जहरीली घास भी होती है जिसका सही प्रयोग न करने पर यह जान पर भारी तक पड़ सकती है।