बाल दिवस पर साल में एक दिन गरीब और बेसहारा बच्चों के प्रति प्यार जताकर रस्म अदायगी की जाएगी। पर इनकी सुध लेने फिर कोई नहीं आता।
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देखिए, बालदिवस पर देवभूमि में 'बचपन' की हकीकत
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योग और आध्यात्म की भूमि उत्तराखंड भी बालश्रम से अछूती नहीं है। यहां आज भी हजारों बच्चे बाल श्रम करने को मजबूर हैं। यह तस्वीर ऋषिकेश की है।
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दो जून की रोटी के लिए रात और दिन कोल्हू के बैल की तरह काम करना पड़ता है।
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हैरानी की बात यह है कि इतना सब कुछ होने के बाद भी जिम्मेदार श्रम विभाग को नगर में बाल श्रमिक नजर नहीं आते जबकि नगर की अधिकतर दुकानों में ये बच्चे मजदूरी करते देखे जा सकते हैं।
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इस छोटी सी उम्र में पेट पालने के लिए कूड़े का रिक्शा खींचना रोज की बात है।
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दिन भर कूड़ा बीनने के बाद कहीं रिक्शा भरता है और उसे बेचकर दो जून की रोटी नसीब हो पाती है।
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ऐसे बच्चों के लिए बाल दिवस और शिक्षा के अधिकार अधिनियम के कोई मायने नहीं रह जाते।
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ये तस्वीर बालदिवस पर आयोजित हो रही बाल विधानसभा की है।