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रैट माइनर्स आए और छा गए: 36 घंटे का मांगा था समय, महज 27 घंटे में ही दिला दी सफलता, ऐसे दिखाई टीम ने करामात

Wed, 29 Nov 2023 11:42 AM IST
रेनू सकलानी संवाद न्यूज एजेंसी, सिलक्यारा(उत्तरकाशी)।
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रैट माइनर्स की टीम - फोटो : अमर उजाला

सिलक्यारा सुरंग में फंसे 41 मजदूरों को बाहर निकालने में रैट माइनर्स दल की भूमिका अहम रही। दिल्ली से आई रैट माइनर्स की टीम ने मैन्युअल ड्रिलिंग के लिए 36 घंटे का समय मांगा था। लेकिन महज 27 घंटे में ही इस टीम ने सफलता दिला दी।

दरअसल, बीते शुक्रवार शाम जब अमेरिकी ऑगर मशीन से ड्रिलिंग का काम केवल 12 मीटर बचा था तो मशीन का ऑगर सरियों में उलझकर फंस गया। जब इसे बाहर निकालने का प्रयास किया गया तो यह टूट गया। मशीन फंसने के कारण ड्रिलिंग का काम बंद होने से हर कोई हताश था।



ऐसे मुश्किल समय में दिल्ली की रॉक वेल इंटरप्राइजेस कंपनी के अंतर्गत काम करने वाले रैट माइनर्स दल को बुलाया गया। इस टीम में करीब 12 लोग शामिल थे। जिन्होंने गत सोमवार दिन में 3 बजे 800 मिमी के पाइप में बैठकर हाथों से खोदाई शुरु की। यह बिल्कुल भी आसान नहीं था।

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रैट माइनर्स की टीम - फोटो : अमर उजाला

इस दल के सदस्यों ने दिन-रात काम कर मंगलवार शाम 6 बजे मैन्युअल ड्रिलिंग को पूरा किया। जिसके माध्यम से 800 मिमी के पाइप के जरिए अंदर फंसे मजदूरों के बाहर निकालने के लिए रास्ता बनाया गया। जिससे सभी मजदूरों को बाहर निकाला गया।

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सिलक्यारा सुंरगसे बाहर निकले मजदूर - फोटो : amar ujala

कंपनी मालिक वकील हसन ने बताया कि दो लड़के पाइप के अंदर बैठकर मिट्टी काटते थे। जबकि चार से पांच लड़के बाहर रहकर मलबा बाहर खींचते थे। इस दल में फिरोज कुरैशी, मुन्ना, नसीम, मोनू, राशिद, इरशाद, नासिर आदि शामिल रहे।

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सिलक्यारा ऑपरेशन सफल - फोटो : amar ujala

रैट माइनर्स के लिए मलबा निकालने के लिए ट्रॉली दिल्ली के सुरेंद्र राजपूत ने तैयार की। उन्होंने बताया कि उन्हें जब इस हादसे की सूचना मिली तो वह यहां निस्वार्थ रुप से मदद करने आए। उन्होंने यहां विशेष प्रकार की ट्रॉली बनाई। जिसकी मदद से आसानी से मलबे को बाहर निकाला गया। बताया कि वर्ष 2006 में हरियाणा कुरुक्षेत्र के निकट एक बच्चा प्रिंस बोरवेल में गिरा था। जिसे बचाने के लिए भी उन्हाेंने मदद की थी।

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ऑगर मशीन के ब्लेड, सरिया, पाइप का मलबा निकाला गया। - फोटो : amar ujala

सुरंग में फंसे 41 मजदूरों को सुरक्षित बाहर निकालने के अभियान में अमेरिकी ऑगर मशीन भी कुछ घंटों में सामने आई बाधाओं के सामने हांफ गई। ऐसे में रैट माइनर्स की टीम ने अपनी करामात दिखाई। अंततः ऑगर मशीन पर मानवीय पंजे भारी पड़े और इनके दम पर 17वें दिन ऑपरेशन सिलक्यारा परवान चढ़ा।

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उत्तरकाशी टनल हादसा - फोटो : amar ujala

17 दिन तक बचाव अभियान में जुटी टीमें मजदूरों का जीवन बचाने के लिए सभी विकल्पों पर काम शुरू कर चुकी थी। बड़कोट की ओर से माइनर सुरंग खोदने, वर्टिकल, मगर जहां ऑगर मशीन फंसी थी, वही विकल्प मजदूरों तक पहुंचने का सबसे करीब जरिया था।

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सुरंग - फोटो : amar ujala
ऑगर मशीन से गार्टर के फंसे टुकड़ों को एक-एक कर बाहर निकाला गया। साथ ही विशेषज्ञों की सलाह पर झांसी से रैट माइनर्स की मदद लेने का फैसला हुआ, जिन्हें सुरंग के भीतर मैनुअली खोदाई की महारत है। झांसी से ग्राउंड जीरो पर पहुंची रैट माइनर्स की टीम ने जैसे-जैसे आगे बढ़ी, उसकी करामात से अभियान के सदस्यों के चेहरों पर चमक दिखने लगी। आखिरकार जहां मशीन हार गई, वहां मानवीय पंजों ने कामयाबी दर्ज की।
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