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इस बार उत्तराखंड में रक्षाबंधन पर यहां नहीं खेला जाएगा 'खूनी खेल', अनोखी है इस परंपरा की कहानी

Sun, 26 Aug 2018 09:39 AM IST
सुरेंद्र राज लडवाल/अमर उजाला, चंपावत
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देवीधूरा का बग्वाल मेला - फोटो : अमर उजाला
उत्तराखंड में रक्षा बंधन के दिन निभाई जाने वाली इस अनोखी परंपरा को अब नहीं निभाया जाएगा। यह परंपरा जितनी पुरानी है उतनी ही अनोखी भी है। आगे जानिए पूरी कहानी...
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देवीधुरा में 26 अगस्त को बगवाल तो होगी मगर, इस बार बगवाल में पत्थर युद्ध नहीं होगा। मां बाराही धाम मंदिर समिति बगवाल में इस बार पूरी तरह फल और फूलों के इस्तेमाल करने के लिए खास प्रयास कर रही है। धाम के पीठाचार्य पंडित कीर्तिबल्लभ शास्त्री ने बगवाल में शामिल होने वाले पक्षों को प्रेरित कर रहे हैं। नियमित रूप से लाउडस्पीकर पर लोगों से बगवाल में पत्थरों से युद्ध न करने की अपील की जा रही है।
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26 अगस्त को देवीधुरा के दुबचौड़ा-खोलीखांण मैदान में होने वाली बगवाल का इंतजार चारों खामों, सातों थोकों के अलावा हजारों लोग भी बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। बगवाल में चम्याल, गहरवाल, लमगडिय़ा और वालिग खाम के अलावा सात थोकों के दर्जनों लोग शिरकत करते हैं। बगवाल में पत्थरों से नहीं खेलने के नैनीताल हाईकोर्ट ने 2013 में आदेश  दिए थे। इसके पीछे पत्थरों से लगने वाली चोट मुख्य वजह थी। कोर्ट ने बगवाल में फल-फूलों का उपयोग करने को कहा था, लेकिन इसके बाद भी बगवाल में पत्थरों का उपयोग थमा नहीं।

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मेला आयोजकों और मंदिर कमेटी ने इस आदेश को मानते हुए फल-फूलों से बगवाल तो खेली, लेकिन कुछ ही मिनटों बाद फल-फूल के बजाय पत्थरों का उपयोग पिछले वर्ष तक होते रहा है। इसके चलते 2017 में ही 11 बगवाली वीर सहित कुल 334 लोग घायल हुए थे। मेला अधिकारी राजेश कुमार का कहना है कि बगवाल में पूरी तरह फल-फूल का उपयोग हो, इसके विशेष प्रयास किए जा रहे हैं।
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सांगों गांव के निवासी हल्द्वानी में फलों के प्रमुख आढ़ती गिरीश जोशी 10.50 कुंतल फल और फूलों की व्यवस्था करेंगे। ये फल-फूल बगवाल वाले दिन यानि 26 अगस्त की सुबह देवीधुरा पहुंचेंगे।  देवीधुरा की बगवाल में साफा (पगड़ी) चारों खामों की पहचान होती है। ये साफे बगवाल के दिन इन वीरों की शोभा बनेंगे। गहरवाल खाम के योद्धा केसरिया, चम्याल खाम के योद्धा गुलाबी, वालिग खाम के सफेद और लमगडिय़ा खाम के योद्धा पीले रंग के साफे पहनकर बगवाल में शिरकत करेंगे। 
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