जिन ग्रहों और नक्षत्रों में सालों पहले भारत का पाकिस्तान और चीन के साथ हुआ युद्ध था। ब्रह्मांड में अब फिर से वही योग बनने जा रहे हैं। ज्योतिषों ने इसे लेकर गहरी चिंता भी व्यक्त की है।
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गुरू ग्रह
दरअसल, देवगुरु बृहस्पति 12 सितंबर को 12 वर्ष बाद तुला राशि में प्रवेश कर रहे हैं। उनका प्रवेश प्रात:काल चित्रा नक्षत्र तृतीय चरण में होगा। तुला राशि में वास्तव में दैत्यों के आचार शुक्राचार्य की राशि है। गुरु को देवताओं का गुरु माना जाता है। शत्रु की राशि में यह परिवर्तन धरती पर कोई न कोई संकट ला सकता है। अतीत में जब भी ऐसा हुआ है तब संकट अवश्य आया है।
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ज्योतिषाचार्य डा. प्रतीक मिश्रपुरी के अनुसार सन 1971 में भारत-पाक के युद्घ में ऐसा ही प्रवेश हुआ था। 1948 के प्रथम भारत-पाक युद्घ में भी गुरु तुला राशि में गए थे। इसी प्रकार चीन युद्घ के समय गुरु की राशि तुला हो गई थी।
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आंकड़े बताते हैं कि प्रथम और द्वितीय विश्व युद्घ के दौरान गुरु की दृष्टि तुला राशि पर पड़ी थी। 1950 में जब दोनों कोरिया युद्घ लड़कर अलग हुए थे तब भी गुरु की दृष्टि तुला पर थी। अब पुन: दोनों कोरिया के बीच संघर्ष बना हुआ है।
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- फोटो : amarujala
ज्योतिषाचार्य डा. प्रतीक मिश्रपुरी के अनुसार इस ब्रह्मांड में गुरु और शुक्र के नेतृत्व में ही ग्रह चलते हैं। शुभ ग्रह और नवग्रह देवगुरु बृहस्पति के संचालन में हैं। इसके विपरीत दैत्य ग्रह शुक्राचार्य के संचालन में चलते हैं। बृहस्पति का शत्रु राशि में जाना कदापि शुभ नहीं कहा जा सकता।
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- फोटो : google
डा. मिश्रपुरी के अनुसार गुरु का तुला में आना पूरे संसार के लिए ही कष्ट उत्पन्न करेगा। यद्यपि अलग-अलग राशियों पर पृथक प्रभाव पड़ने वाला है। मिथुन, सिंह, कन्या, धनु और कुंभ राशि पर इस प्रवेश का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
शेष राशियां प्रभावित होंगी। गुरु के तुला के प्रवेश से बेमौसम वर्षा के योग बनते हैं। यद्यपि ऐसा जब भी ऐसा हुआ है घी, तेल और वनस्पति सस्ते हुए हैं। राशियों का प्रभाव टालने के लिए ज्योतिष में अनेक विधान बताए गए हैं। यह राशि प्रवेश जिस दिन होगा, उसी दिन से प्रभाव प्रारंभ हो जाएगा।