ग्लोबल वार्मिंग का दुष्प्रभाव पिंडारी ग्लेशियर और इसके आसपास के क्षेत्र पर पड़ रहा है। ग्लेशियर से निकलकर पिंडर नदी में मिलने वाला पानी घट गया है, इसके साथ ही आसपास के इलाकों के जलस्रोत सूख रहे हैं।
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उत्तराखंड विज्ञान शिक्षा एंव अनुसंधान केंद्र (यूसर्क) के हालिया अध्ययन से उजागर हुआ है। विज्ञानियों की टीम ने मौके पर जाकर जलस्रोतों की स्थिति देखी। टीम का कहना है कि जो जलस्रोत अभी जीवित हैं, उनमें पानी की मात्रा घट गई है। विज्ञानियों ने पिंडारी ग्लेशियर और पिंडर नदी के संरक्षण का मशविरा दिया है।
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पिंडर ग्लेशियर और इसके निकलने वाली पिंडर नदी जल संसाधन की दृष्टि से अहम है। पिंडर नदी हिमालय के नंदादेवी शिखर के पास से निकलकर कर्णप्रयाग में अलकनंदा नदी से आकर मिलती है। जो इसका रास्ता है, वहां आसपास के जलस्रोत रिचार्ज करने में इसकी महती भूमिका है। सर्वेक्षण रिपोर्ट में बताया गया कि ग्लेशियर से बहुत कम पानी नदी में आ रहा है। इसके अलावा लोहारखेत से तल्ला धाकुड़ी तक सात किमी रेंज में विज्ञानियों को छह जलस्रोत मिले, जिनमें दो पूरी तरह सूख चुके हैं।
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परथली, विच्छो गदेरे में 20 वर्ष पहले 12 इंच तक पानी बहता था, जो अब 6 इंच गहरा रह गया है। छतरिया बुरांश में भी पानी आधा रह गया है। कलभेड़ा में जब पेयजल योजना बनी थी तो पानी 10 इंच तक था, जो अब चार इंच रह गया है। इससे योजना खतरे में पड़ रही है। यही हालत भुल्युड़ा पेयजल योजना की हो गई है। धाकुड़ी से खाती गांव तक जो नौ प्राकृतिक जलस्रोत हैं, वे अब सूखने की कगार पर हैं। खरखरिया गांव के आसपास पांच प्राकृतिक जलस्रोत थे, जो अब सूख चुके हैं।
पिंडारी ग्लेशियर और पिंडर को फिर से सेहतमंद करने के लिए बड़ी कार्ययोजना की जरूरत है। ये बचे रहेंगे तो जलस्रोत बचे रहेंगे। - डॉ. दुर्गेश पंत, निदेशक, उत्तराखंड विज्ञान शिक्षा एंव अनुसंधान केंद्र