जागेश्वर धाम में पार्थिव पूजा का विशेष महत्व है। अपने आवास पर पार्थिव पूजा की शुरुआत करने से पहले जागेश्वर धाम में ही पार्थिव पूजा की जाती है। इसके बाद हर वर्ष घर पर पार्थिव पूजा की जाती है। दूरदराज से श्रद्धालु यहां इच्छित फल की आकांक्षा में पार्थिव पूजा कराने आते हैं। बताया जाता है कि 7वीं से 13वीं सदी में जागेश्वर धाम का जीर्णोद्धार हुआ था, तब से यहां पारंपरिक ढंग से ही पूजा-पाठ होती है, इसमें किसी तरह का कोई बदलाव नहीं हुआ है।
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अल्मोड़ा जिला मुख्यालय से करीब 35 किमी दूर देवदार के पेड़ों और 108 शिव मंदिरों से घिरे भगवान शिव के धाम की अपनी विशिष्टता है। यहां कमल कुंड के साथ ही पास से जटा गंगा नदी भी गुजरती है। नैसर्गिक सौंदर्य भी यहां का अद्भुत है। यहां लगे देवदार के वृक्ष काफी पुराने हैं। बताया जाता है कि धाम परिसर स्थित एक देवदार का वृक्ष 1500 वर्ष पुराना है। यहां देसी विदेशी श्रद्धालुओं का वर्षभर आना जाना लगा रहता है। मान्यता है कि भगवान शिव के वासस्थल जागेश्वर धाम में जो भी मांगो वह मुराद जरूर पूरी होती है।
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वैसे तो जागेश्वर धाम में महामृत्युंजय जाप, नव गृह पूजा के साथ ही हवन यज्ञ और पितृ तारण भी किया जाता है, लेकिन पार्थिव पूजा का यहां विशेष महत्व है। मान्यता है कि अपने निजी घर पर पार्थिव पूजा की शुरुआत करने से पहले जागेश्वर धाम में ही पार्थिव पूजा की जाती है। इसके बाद हर वर्ष घर पर पार्थिव पूजा की जाती है।
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धाम के पुजारी भगवान भट्ट बताते हैं कि यहां पार्थिव पूजा करने के बाद हर मुराद पूरी होती है। यहां प्रतिदिन काफी संख्या में श्रद्धालु पार्थिव पूजा कराने आते हैं। पार्थिव पूजा में कांस्य की पराद में सैं धान के चावल के आटे से 108 शिवलिंग बनाकर करीब चार घंटे तक पूजा की जाती है। इसके बाद हवन यज्ञ होता है और अंत में आरती के साथ पार्थिव पूजा का समापन होता है।
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- धाम के पुजारी भगवान भट्ट बताते हैं कि घर में सुख-शांति, पुत्र प्राप्ति से लेकर रोग निवारण तक के लिए पार्थिव पूजा की जाती है। यह चार तरह की होती है।
- पुत्र प्राप्ति को: सैं धान के चावल के आटे से 108 शिवलिंग बनाकर पुत्र प्राप्ति के लिए पूजा की जाती है।
- सर्वजन कामना को: दीमक की मिट्टी से सर्वजन कामना के लिए यह पूजा होती है।
- धन प्राप्ति को: मक्खन के शिवलिंग से धन प्राप्ति के लिए पार्थिव पूजा होती है।
- रोग निवारण को: गाय के गोबर से रोग निवारण के लिए पार्थिव पूजा की जाती है।
जागेश्वर धाम में भोग पूजा का भी विशेष महत्व होता है। इस समय में धाम के कपाट बंद कर भगवान को भोग (भोजन) लगाया जाता है। इस दौरान मंदिर में श्रद्धालुओं का प्रवेश वर्जित होता है। सर्दियों में सुबह दस से 11 बजे और शाम को साढ़े पांच से साढ़े छह बजे तक भोग पूजा होती है, जबकि गर्मियों में सुबह 9 से 10 और रात 8 से 9 बजे तक भोग पूजा की जाती है। प्रात:कालीन पूजा सुबह 4 बजे होती है, इसके समय में कोई परिवर्तन नहीं होता है। जागेश्वर धाम में भी नोटबंदी का असर दिखाई दिया। भगवान के दर पर पहुंचे श्रद्धालुओं को 500-1000 के नोट नहीं चलने से दिक्कतें झेलनी पड़ रही है। पुजारियों ने भी 5 सौ और 1000 के नोट लेने से मना कर दिया। इस बीच कई श्रद्धालुओं की पूजा भी नि:शुल्क कराई गई।