राजौरी में आईईडी विस्फोट में शहीद मेजर चित्रेश बिष्ट का आवास देहरादून में नेहरू कॉलोनी में है। घर में सांत्वना देने वाले लोगों का जमावड़ा लगा है।
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chitresh singh
पिता एसएस बिष्ट को सब समझा रहे हैं लेकिन उनकी आंखों से आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। मन पर पहाड़ जैसा बोझ है।
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martyr major chitresh bisht
सवाल परेशान कर रहा है, जिस छोटे लाडले बेटे को कभी गोद में खिलाया। अंगुली पकड़कर चलना सिखाया। अब उसे इस हालत में कैसे देख पाऊंगा। हर आने-जाने वाले के सामने पिता अपने शहीद बेटे की ही बात कर रहे हैं।
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आवास पर पहुंचा शहीद का पार्थिव शरीर
- फोटो : अमर उजाला
रूंधे गले से बोले...हमेशा जल्दी में ही रहा। अब जल्द ही चला भी गया...कहते-कहते उनकी आंखों से आंसू टपकने लगे। आसपास बैठे लोगों ने उन्हें ढाढ़स बंधाया। कभी जिंदादिल इंस्पेक्टर रहे एसएस बिष्ट आज बेटे के गम में टूट चुके हैं।
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martyr major chitresh bisht
घर के आंगन में सोनू का पहला कदम और सरहद पर मेजर चित्रेश की आखिरी सांस... सब मानो जैसे उनकी आंखों के सामने ही चल रहा था। बचपन से लेकर अब तक की हर बात को याद कर बोले...सोनू, बेटे तू हमेशा जल्दी में ही रहा।
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शहीद चित्रेश बिष्ट (फाइल फोटो)
सब बच्चों से अलग सात माह में ही पैदा हो गया। सब बच्चों से अलग दस माह में ही अपने पैरों से चलने लगा। सब दोस्तों से अलग जल्द ही सेना में अफसर बन गया और अब...फिर जुबान लड़खड़ा गई। गला रूंध गया...अब जल्द ही चल भी गया।
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शहीद चित्रेश बिष्ट (फाइल फोटो)
मेजर चित्रेश के साथ आईएमए में प्रशिक्षण लेने वाले एक अधिकारी ने बताया कि वे किसी भी चुनौती से नहीं डरते थे। आईएमए से ही उनके जोश की तारीफ होती थी।
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martyr chitresh bisht
शहीद मेजर चित्रेश बिष्ट के घर के बाहर दिनभर लोगों का जमावड़ा रहा। दिनभर उनके घर के बाहर भारत माता की जय, शहीद चित्रेश अमर रहे के नारे लगते रहे।
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martyr major chitresh bisht
- फोटो : अमर उजाला
हाल में ही सेना से रिटायर राजीव कंसवाल भी शहीद मेजर चित्रेश के घर पहुंचे। उन्होंने बताया कि बड़े अभियानों में चित्रेश सेना की पहली पसंद रहते थे। राजीव दो साल मेजर चित्रेश के साथ भी रहे। राजीव ने बताया कि पूरी टीम को पीछे कर वह हर काम में खुद आगे रहते थे।
मेजर चित्रेश के पिता भी कहते हैं कि पहली बार सोनू जब एनएसजी ट्रेनिंग के लिए गया तो पैर में दिक्कत हो गई। उसे वापस लौटना पड़ा। बावजूद इसके वह एनएसजी में जाने के लिए फिर तैयारी करने लगा। दूसरी बार भी पांव में दिक्कत की वजह से वह एनएसजी में नहीं जा पाया।