राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार से सम्मानित बहादुर बच्चों को पुरस्कार दिए जाने के बाद उनकी जिंदगी कैसी होती है यह इस बच्चे की कहानी बहुत अच्छे से बयां करती है।
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National Bravery Award
जी हां, लोग यह मानते हैं कि उन बच्चों की जिंदगी संवर जाती है, लेकिन सच ये है कि सरकार उन्हें भुला देती है। वर्ष 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार प्राप्त करने वाला अर्जुन इन दिनों देहरादून में पढ़ाई पूरी करने के लिए पार्ट टाइम जॉब ढूंढ रहा है। अर्जुन के मुताबिक तत्कालीन प्रदेश सरकार ने 50 हजार रुपये की आर्थिक सहायता का आश्वासन दिया था, लेकिन आज तक सहायता नहीं मिली।
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गुलदार से मां की जान बचाने वाले टिहरी के मालगांव निवासी अर्जुन के मुताबिक राजकीय इंटरमीडिएट कालेज मधकुडीसैंण से विज्ञान वर्ग से इंटरमीडिएट की पढ़ाई पूरी करने के बाद वे देहरादून से स्नातक की पढ़ाई करना चाहता है।
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पढ़ाई के लिए देहरादून आया हुआ है, लेकिन कालेज में दाखिला लेने के साथ ही वह पार्ट टाइम जॉब भी ढूंढ रहा है। वे कहता है कि कही कोई पार्ट टाइम जॉब है तो बताएं ताकि वह पार्ट टाइम जॉब कर अपनी पढ़ाई पूरी कर सके। अर्जुन चार भाई बहनों में सबसे छोड़ा है।
उसकी मां टिहरी के स्कूल में भोजन माता है जिसे मुश्किल से डेढ़ हजार रुपये मानदेय मिलता है। जबकि उसके पिता सोहन सिंह की 14 साल पहले दिल का दौरा पड़ने से मौत हो चुकी है। वही 2016 में राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार प्राप्त देहरादून का रायपुर ब्लॉक निवासी सुमित ममगाई इंटर कालेज भगद्वारीखाल में दसवीं का छात्र है। वे बताता है कि जो आश्वासन मिला उस पर अमल नहीं हुआ।