फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

देखिए, एक ऐसा मंदिर जहां ये गलती करने से भक्त हो जाते हैं अंधे

Mon, 20 Mar 2017 09:25 AM IST
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, देहरादून
विज्ञापन
1 of 6
लाटू मंदिर
उत्तराखंड के देवाल स्थित पर्यटन एवं धार्मिक स्थल वाण के लाटू मंदिर में श्रद्धालु अंदर प्रवेश नहीं करते, बल्कि मंदिर से 30 मीटर दूर परिसर में ही रहकर पूजा करते हैं।
विज्ञापन

2 of 6
लाटू मंदिर
वाण गांव हर बारह साल में होने वाली सबसे लंबी पैदल यात्रा श्रीनंदा देवी राजजात यात्रा का 12वां पड़ाव है। लाटू देवता को मां नंदा का धर्म भाई माना जाता है और वह यात्रा के दौरान वाण से लेकर होमकुंड तक यात्रा की अगुवानी करते हैं। हर साल बैशाख पूर्णिमा के दिन लाटू देवता मंदिर के कपाट खोले जाते हैं।
 
विज्ञापन

3 of 6
लाटू मंदिर
ग्रामीण हीरा सिंह ने बताया कि 5 से 7 की संख्या में गांव के लोग, कुल पुरोहित तथा लाटू के पुजारी देव स्तुति करते हैं। यहां से मंदिर में प्रवेश केवल मंदिर के पुजारी आंख पर पट्टी बांधकर ही करते आए हैं।
 

4 of 6
लाटू मंदिर
अगर मंदिर के अंदर पुजारी बिना आंखों पर पट्टी पर बांधकर जाता है तो वहां से एक तेज रोशनी निकलती है जिससे व्यक्ति अंधा हो जाता है। इसलिए यहां पुजारी हमेशा आंखों पर पट्टी पर अंदर जाता है।
 
विज्ञापन

5 of 6
लाटू मंदिर
हीरा सिंह, खीम सिंह ने बताया कि लोककथाओं के अनुसार लाटू को मां नंदा का धर्म भाई माना गया है। जब मां नंदा अपने धर्म भाई लाटू के साथ वाण से कैलाश की ओर जा रही थी तब वाण में लाटू को प्यास लगने पर उसने गलती से एक घड़े में रखे जाम को पानी समझकर पी लिया था। इससे कुपित होकर लाटू ने अपनी जीभ काट दी। इसी दिन से इनकी पूजा की जाती है।
 
विज्ञापन
विज्ञापन

6 of 6
लाटू मंदिर - फोटो : Amar Ujala
वाण में एक परंपरा और भी है। यहां के लोग अपनी बेटियों की विदाई डोली से नहीं बल्कि घोड़े पर बैठाकर करते हैं। इस गांव के लोग लाटू देवता और भगवती को अपना ईष्ट मानते हैं। मान्यता है कि इस गांव से राजजात यात्रा तथा लोकजात यात्रा में भगवती की डोली को ग्रामीण कैलाश ले जाते हैं। गांव के पान सिंह के अनुसार डोली में देवी के अलावा किसी को नहीं बैठाया जाता है। इसलिए बेटियों को घोड़े पर विदा किया जाता है।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें