प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बदरीनाथ धाम, माणा गांव दौरा निरस्त हो गया, लेकिन इससे माणा गांव चर्चा में आ गया। संयोगवश पीएम के प्रस्तावित दौरे को लेकर माणा में लोगों से चर्चा हुई तो उनके भारत के प्रति समर्पण की कहानी सामने आई।
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mana village
- फोटो : GirishRanjalTiwari
मंगोलियन मूल के होने के बावजूद यहां के निवासियों ने इस क्षेत्र को भारत से जोड़ने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। बदरीनाथ से तीन किलोमीटर दूर स्थित भारत-चीन/तिब्बत सीमा के अंतिम गांव माणा के नागरिकों ने चीन के भारी दबाव और लालच के बावजूद इस समूचे क्षेत्र को चीन के प्रभुत्व में आने से बचाकर भारत में शामिल कराने में अहम भूमिका निभाई।
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- फोटो : AmarUjala
वरना एक समय ऐसा भी था जब भारत की ओर से इसे अपने देश में बनाए रखने के प्रयास ही नहीं रह गए थे। माणा निवासियों को अपने पूर्वजों के इस निर्णय और उनकी भूमिका पर आज भी फख्र है।
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समुद्र तल से 10,248 फीट की ऊंचाई पर स्थित यह भारतीय सीमा का अंतिम गांव है। माणा से 24 किमी दूर भारत-चीन सीमा है। 1962 के भारत-चीन युद्ध तक इस क्षेत्र के निवासियों के भारतीय नागरिक होने पर स्वयं भारत को संशय था और माणा के भोटिया जनजाति निवासी जो मंगोल जाति के वंशज हैं, वे चीनी नागरिक समझे जाते थे।
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- फोटो : GirishRanjalTiwari
उन्हें भारतीय नागरिकता तक हासिल नहीं थी। तब यहां से 50 किमी दूर जोशीमठ के आगे से यहां पैदल आना होता था। यहां के नागरिक बताते हैं कि तब भारत दूर और चीन नजदीक था और चीनी नागरिक खुलेआम यहां तक आते थे। यहां तक कि माणा के निवासी भी चीनी भाषा बोलते और समझते थे।
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- फोटो : GirishRanjalTiwari
माणा में स्थित अंतिम भारतीय दुकान चलाने वाले भूपेंद्र सिंह टकोला बताते हैं कि इस सबके बावजूद भारत-चीन युद्ध में यहां के निवासियों ने चीन के दबाव और प्रलोभन को दरकिनार कर भारतीय फौज का साथ दिया और क्षेत्र को भारत में बनाए रखने में भूमिका निभाई।
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इसके बाद सरकार का ध्यान यहां के नागरिकों पर और इस क्षेत्र पर गया तथा उन्हें नागरिकता और अन्य अधिकार मिले। बाद में बदरीनाथ और माणा तक सड़क भी पहुंचाई गई और आईटीबीपी की चौकी स्थापित की गई। 1962 तक यह क्षेत्र उपेक्षित और सीमा पूरी तरह खुली और असुरक्षित थी। आर्मी तो दूर यहां कोई सुरक्षा बल भी तैनात न थे।
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माणा गांव का धार्मिक महत्व भी बहुत है। मान्यता है कि यहीं से होकर पांडव सशरीर स्वर्ग गए थे। वेद व्यास ने महाभारत की रचना भी यहीं की थी।
माणा सरस्वती नदी का उद्गम भी है, जो मात्र 500 मीटर दूर माणा में ही केशव प्रयाग में अलकनंदा में मिल जाती है। मान्यता है कि इस नदी पर विशाल चट्टान का पुल बनाकर भीम ने रास्ता बनाया था।