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Kumbh Mela 2021: जहां हर कुंभ में स्नान करते हैं करोड़ों श्रद्धालु, जानते हैं कैसे पड़ा उस हरकी पैड़ी का नाम, पढ़ें रोचक बातें...

Sat, 30 Jan 2021 05:51 PM IST
अलका त्यागी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हरिद्वार
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कुम्भ मेला 2021 - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो
जिस हरकी पैड़ी पर करोड़ों तीर्थ यात्री कुंभ स्नान करने आते हैं क्या आप जानते हैं उसका नाम कैसे हरकी पैड़ी रखा गया। हरकी पैड़ी का प्राचीन नाम उज्जैन के राजा भर्तृहरि के नाम पर भर्तृहरि की पैड़ी था। भर्तृहरि ने राजपाट त्यागकर वर्तमान हरकी पैड़ी के ऊपर वाली पहाड़ी पर बैठकर वर्षों तपस्या की थी। भर्तृहरि जिस मार्ग से उतरकर गंगा स्नान के लिए आते थे, उस पर भर्तृहरि के भाई राजा विक्रमादित्य ने सीढ़ियां बनवाई। 
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हरकी पैड़ी - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो
उन सीढ़ियों को भर्तृहरि की पैड़ी नाम दिया गया। कालांतर में यही पैड़ियां हरकी पैड़ी के नाम से विख्यात हुई। इसी स्थल पर कुंभ आदि महापर्वों के स्नान होते हैं। राजा भर्तृहरि ने यहीं बैठकर कालजयी नीति शतक और वैराग्य शतक की रचना की।
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हरकी पैड़ी - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो

ईसा से 57 वर्ष पूर्व जब भर्तृहरि ने राजपाट त्यागकर हरिद्वार का गंगातट अपनाया तब विक्रमादित्य का राज्याभिषेक हुआ। भर्तृहरि मनसा देवी पर्वत के ठीक उस भाग पर तपस्या कर रहे थे, जो ब्रह्मकुंड हरकी पैड़ी के ऊपर है। वे रोजाना गंगा स्नान के लिए आते। छठी शताब्दी में कुंभ देखने हरिद्वार आए चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी इन्हें भर्तृहरि की पैड़ी कहकर संबोधित किया। 
 

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हरकी पैड़ी - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो
भर्तृहरि के नाम का आधा हरि शब्द लेकर हरकी पैड़ी नाम पड़ा। भर्तृहरि के नाम से एक गुफा आज भी इसी पर्वत के नीचे अपर रोड स्थित नाथों के दलीचे में मौजूद हैं। विक्रमादित्य के दरबार के रत्न महाकवि कालिदास ने अपने विश्व प्रसिद्ध महाकाव्य मेघदूत में इस स्थल और कनखल का वर्णन किया है।
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हरकी पैड़ी - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो
बता दें कि धरती पर लगने वाले कुंभ को महाकुंभ नहीं बल्कि महापर्व कहा जाता है। कुंभ मेले ग्रहों की चाल पर निर्भर हैं। जब भी बृहस्पति, सूर्य और चंद्र प्रत्येक कुंभ लिए निर्धारित राशियों में प्रवेश करते हैं तभी हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक में कुंभ महापर्व पड़ते हैं। समुद्रमंथन की गाथा के अनुसार अमृत कलश धरती के चार स्थानों पर रखा गया था।
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हरकी पैड़ी - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो
लेकिन राहु केतु से अमृत कलश को बचाने के लिए गरुड़ स्वर्ग और शेष ब्रह्मांड के चार स्थानों पर भी गए। अमृत कलश वहां भी छलका। इस प्रकार कुल बारह स्थानों पर कुंभ भरते हैं। शास्त्रों की कालगणना के अनुसार प्रयागराज में 12 कुंभ बीतने अर्थात धरती पर 144 वर्ष बीतने के बाद किसी आकाशीय लोक में महाकुंभ भरता है। इस गणना के अनुसार समुद्रमंथन के बाद धरती पर कुंभ का पहला ग्रहीय योग प्रयागराज में पड़ा था। 
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