द्वापर युग में महाभारत युद्ध के उपरांत केदारनाथ में भगवान शिव ने पांडवों को दर्शन देकर उन्हें गोत्र, गुरु व ब्राह्मण हत्या के दोष से मुक्त किया था। यहां भगवान के स्वयंभू लिंग के पृष्ठ भाग की पूजा होती है। साथ ही प्रतिदिन आराध्य को भोग लगाया जाता है। मान्यता है कि द्वापर में महाभारत युद्ध में पांडवों पर गोत्र व गुरु हत्या का पाप लगा था। तब, उन्हें महर्षि नारद ने हिमालय भ्रमण कर भगवान शिव के दर्शन करने को कहा था। इसके बाद पांडव द्रोपदी के साथ केदारघाटी के गांवों से होते हुए केदारनाथ धाम पहुंचे थे। लेकिन भगवान शिव उन्हें दर्शन नहीं देना चाहते थे और पांडवों से दूर-दूर भागते रहे। जबकि पांडव आराध्य शिव का पीछा करते रहे। इस मौके पर भगवान शिव ने पांडवों से बचने के लिए भैंस का रूप धारण कर लिया और केदारपुरी क्षेत्र में विचरण करते हुए भैंसों के समूह में मिल गए। केदारनाथ पहुंचे पांडवों में भीम ने भगवान शिव को पहचान लिया, यह देख भैंस का रूप धारण किए हुए भगवान शिव भूमि में धंसने लगे। लेकिन भीम ने भैंस का पृष्ठ भाग पकड़ लिया। इसके बाद भगवान शिव ने प्रसन्न होकर पांडवों को दर्शन देकर गोत्र व गुरु हत्या के पाप से मुक्त किया।