साल 2013 में उत्तराखंड पर आज ही के दिन कुदरत की विनाश लीला ने कोहराम मचाया था। इस महाप्रलय को पांच साल बीत गए, लेकिन भयानक मंजर को बयां करती ये कहानियां आज भी झकझोर देती हैं।
विज्ञापन
2 of 13
केदारनाथ आपदा
- फोटो : amar ujala
केदारघाटी में आई आपदा ने इंसानी फितरत के कई रूप सामने ला दिए थे। पहला पक्ष इंसानी फितरत लोभी की थी। जिसका नजारा गौरी गांव में दिखाई दिया। यहां पर आपदा के कारण फंसे लोगों को मदद करने के बजाए उन्हें लूटा जा रहा था। कुछ स्थानीय लोग मदद करने के एवज में लोगों से पैसे ले रहे थे। हवाई सेवाओं के जरिए फेंके जा रहे फूड पैकेट को भी कब्जे में करके बेच रहे थे। वहीं कुछ नेपाली मजदूरों द्वारा तीर्थ यात्रियों के जेवरात, कपड़े व सामान लूटने की घटना भी सामने आई। एक छोटी मदद करने के लिए भी हजार रुपये तक मांग रहे थे। लेकिन क्षेत्र में कुछ लोग ऐसे भी थे जो अतिथि देवों भव: की कल्पना को चरित्रार्थ कर रहे थे। ऐसे ही एक इंसान हैं पावर हाऊस सोनप्रयाग में तैनात दर्शन लाल गैरोला। आपदा के वक्त अतिवृष्टि व मंदाकिनी नदी में आई बाढ़ के कारण 17 जून को लगभग तीन हजार तीर्थ यात्री सोनप्रयाग व मुंडकट्या के बीच फंस गए थे। सोन गंगा नदी का पुल बहने से फंसे लोगों को नदी पार करने में दिक्कतें हो रही थी। लोगों की स्थिति को देखते हुए श्री गैरोला का दिल पसीज गया और उन्होंने कुछ साथियों के साथ मिलकर मदद की ठानी। एक रस्सी के सहारे नदी के दूसरे छोर पर खड़े लोगों के पास तक कुल्हाड़ी पहुंचाई और एक बड़ा पेड़ काटने का इशारा किया। पेड़ काटने के बाद इसे पावर हाउस से अटका कर अस्थाई पुल बनावाया। जिससे फंसे लोग आर-पार हो पाए।
विज्ञापन
3 of 13
केदारनाथ आपदा
- फोटो : amar ujala
आपदा के वक्त बदरीनाथ में होटल में पानी घुसने पर यहां ठहरे लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाने को कहा गया था। होटल में रुके सहारनपुर निवासी सविता और उसके रिटायर्ड बैंक अधिकारी पति भी सुरक्षित ठौर की तलाश में बाहर निकले। होटल के बाहर बाढ़ जैसे हालात में हर तरफ मौत की गूंज थी। सविता और उसके पति एक-दूसरे का हाथ थामे पहाड़ पर ऐसे स्थान की तलाश कर रहे थे, जहां पानी का बहाव न हो। घंटों सुरक्षित स्थान की तलाश में सुबह हो गई। पानी और मलबे के साथ आया हल्की गति का झोंका सविता के पति को लगा। वह चोटिल हो गए, साहसी सविता ने पति का हाथ नहीं छोड़ा। मलबे से बचाया तो वह अचेत थे। सहायता के लिए घंटों चीखती रही, लेकिन कोई सुनने वाला नहीं था। पति को खो चुकी सविता ने शव को सुरक्षित जगह रखा और बारिश रुकने, मदद मिलने का इंतजार करती रही। प्रशासन की टीम ने पति के शव के साथ फफकती सविता से घर का पता और मोबाइल नंबर लिया।सविता के बेटे मुकेश नागपाल को प्रशासन ने पिता सुरेंद्र नागपाल की मौत होने, मां के जिंदा होने की सूचना दी। मुकेश देहरादून में सहस्रधारा स्थित हैलीपैड पहुंच गया था। सुबह से शाम तक बदरीनाथ जाने के लिए व्यवस्था में लगा रहा। मुकेश ने बताया कि उन्हें बदरीनाथ ले जाने के लिए दो लाख रुपये मांगे जा रहे थे। तब हैलीपैड पहुंचे पूर्व सीएम विजय बहुगुणा के बेटे साकेत बहुगुणा को देखकर मुकेश हाथ जोड़कर रोने लगा। इसके बाद साकेत ने कंपनी संचालकों से उसे बदरीनाथ पहुंचाने को कहा और खुद चॉपर में सवार होकर मातली चले गए। तब जाकर मुकेश को कंपनी संचालक बदरीनाथ ले गए।
4 of 13
kedarnath dham after three years of disaster
- फोटो : file photo
आपदा को भंयकर मंजर देख केदारनाथ से दून पहुंची दिल्ली निवासी नेहा मिश्र ने बताया था कि 17 जून 2013 की सुबह तकरीबन छह बजे धमाके की आवाज आई। किसी को पता नहीं चला कि क्या हुआ। करीब सात बजे अचानक बचाओ-बचाओ की आवाज गूंजी। आपदा में मां, दादी और नानी को खो देने वाली नेहा ने बताया कि पानी के रूप में प्रलय दबे पांव आया। इससे पहले कि किसी को एहसास होता पानी मंदिर में तेजी से चारों तरफ घूमा और परिसर के दक्षिणी गेट को तोड़ता मौजूद श्रद्धालुओं को मलबे में दफन कर गया। मंदिर के चारों ओर 400 मीटर एरिया में मौजूद सात हजार लोगों में से एक हजार ही बचे। बचने वाले भी वे हैं जो होटलों और भवनों के ऊपर वाले तलों पर पहुंच गए थे। जल प्रलय के बाद हर तरफ केवल मलबा-ही-मलबा था। डर इतना कि कहीं पैर के नीचे कोई शव न हो।
विज्ञापन
5 of 13
most horrible photos of kedarnath disaster
आपदा के दिन तीर्थयात्री तेज बारिश के बीच गंगोत्री से लौट रहे थे कि मल्ला के पास भूस्खलन होने लगा। कुछ देर वाहन रोका तो पूरा मार्ग मलबे में पट गया। चार दिन किसी तरह खुले आसमान के नीचे काटे। अब तो बस भगवान एक बार हमें घर पहुंचा दे तो दोबारा यहां आने की नहीं सोचेंगे। यहां असुविधाएं ऐसी कि जैसे शासन-प्रशासन है ही नहीं। गंगोत्री घाटी से 25 से 30 किमी पैदल दूरी तय कर उत्तरकाशी पहुंचे रतलाम मध्यप्रदेश के 120 तीर्थयात्रियों ने अपनी पीड़ा ऐसे ही बयां की थी। यात्री दल में शामिल रामचंद्र ने बताया कि जीवन के छह दशक पार कर चुका हूं, लेकिन ऐसी त्रासदी कभी नहीं देखी। इसी दल में शामिल रमेश सोलंकी ने कहा कि भगवान एक बार हमें सकुशल घर पहुंचा दें तो दोबारा यहां आने की नहीं सोचेंगे। नलूणा में फंसे सांगानेर जयपुर के नंदकिशोर ने बताया कि जब बारिश हो रही थी, तब हमें यकीन नहीं हो रहा था कि घर जा भी पाएंगे या नहीं। पास के गांव में 25 हजार रुपये में तीन कमरे लेकर किसी तरह भूखे-प्यासे चार दिन काटे थे।
विज्ञापन
6 of 13
most horrible photos of kedarnath disaster
केदारघाटी की आपदा के बाद जहां एक ओर अपनी पीड़ा को भुलाकर दूसरों की मदद करने की कहानियां आ रही थीं, वहीं दूसरी ओर ऐसी सूचनाएं आ रही थीं कि जिस पर यकीन करना भी मुश्किल हो रहा था। आपदा वाले दिन केदारनाथ में ही मौजूद निजामुद्दीन, चर्च लेन, नई दिल्ली के सुरेश गुप्ता और महेंद्र कुमार ने बताया कि कुछ लोगों ने केदारनाथ मंदिर में भी लूटपाट की। मूर्तियों के जेवर-गहने और दानपात्र से पैसे भी निकाले गए। यही नहीं, कुछ लोगों को महिलाओं के शवों से भी जेवर-गहने उतारते देखा गया।
विज्ञापन
7 of 13
disaster in uttarakhand
- फोटो : अमरउजाला
उत्तराखंड में आई आपदा का मातम सोशल मीडिया या भारतीय अखबारों में ही नहीं विदेशी मीडिया में भी पसरा था। अमेरिका का प्रमुख अखबार 'द वाल स्ट्रीट जरनल' केदारनाथ में आई आपदा पर बराबर नजर रखी। इस अखबार ने पीड़ितों को मदद देने के लिए भारतीय सेना और आईटीबीपी की पीठ भी ठोकी। इसके अलावा अमेरिका के दूसरे प्रमुख अखबार 'वाशिंगटन पोस्ट' ने भी उत्तराखंड की पीड़ा को दुनिया की बड़ी आपदाओं में बताया था। इंग्लैंड के अखबार 'द गार्जियन' भी उत्तराखंड की आपदा को लेकर संजीदा दिखा। इस अखबार ने भी उत्तराखंड सरकार की सुस्ती के साथ ही सेना और अर्द्धसैनिक बलों के आपरेशन की तारीफ की। पड़ोसी देश पाकिस्तान और भूटान आपदा को लगातार कवरेज दी।
8 of 13
केंद्रीय पेयजल एवं स्वच्छता मंत्री उमा भारती
- फोटो : amar ujala
तब भाजपा नेता उमा भारती ने कहा था कि उत्तराखंड में आपदा देवी की मूर्ति हटाने के कारण ही आई है। उन्होंने राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से मुलाकात कर देवी की मूर्ति मूलस्थान पर रखने का आग्रह किया था। उमा ने कहा था कि धारी देवी को उत्तराखंड के लोगों तथा चारधाम यात्रियों का रक्षक माना जाता है। यह भी संयोग है कि श्रीनगर विद्युत परियोजना के लिए धारी देवी की मूर्ति को 16 जून को हटाया गया था। इसके बाद ही विनाशलीला देखने को मिली। उन्होंने उस वक्त उत्तराखंड सरकार पर त्रासदी से निपटने में ढुलमुल तरीके से काम करने का आरोप लगाया था।
9 of 13
most horrible photos of kedarnath disaster
केदारघाटी से लौटी राजधानी के डाक्टरों की टीम का कहना था कि घाटी में महा विनाश देखकर पौराणिक कथाओं में वर्णित शिव तांडव याद आता था। बताया कि घाटी में लगातार भूस्खलन हो रहा था। रातों में भयानक आवाजें सुनाई देती थीं। चट्टानों के गिरने से तेज धमाका होता था। 12 फुट मलबे में दबी लाशों पर चलकर ही राहत कार्य किया जा रहा था। मलबे में कितने लोग दबे हैं इसका अंदाजा ही नहीं था। वहां मौजूद जानवरों का मिजाज उग्र हो गया था। आदमी को देखते ही खच्चर और गाय मारने को दौड़ते थे।
10 of 13
most horrible photos of kedarnath disaster
हरिद्वार के थानाराम आश्रम में अतुल ने उस दिन की रोंगटे खड़े करने वाली दास्तां बताई। अतुल ने बताया कि 16 जून 2013 समय लगभग सुबह आठ बजे हम लोग सात छात्र तथा गुरुजी घारीवाल कोठी में थे तभी पानी आने का हल्ला हुआ। हम बाहर आकर दूसरी बिल्डिंग में गए। एक-एक करके वहां नाव की तरह भवन बह रहे थे। पानी की लहरों ने मुझे एक बिल्डिंग की छत पटक दिया था। मैं बुरी तरह से घायल हो गया। इस बीच एक साधु उठाकर मुझे नीचे एक गेस्ट हाउस में ले गए। चार घंटे तक वहां रहा उसके बाद वापस ऊपर चढ़कर केदारनाथ मंदिर के अंदर घुस गया। 16 जून का पूरा दिन और पूरी रात मंदिर के अंदर ठंड में ठिठुरते हुए काटी। 17 की सुबह मैं अकेला पैदल पहाड़ी-पहाड़ी से चलकर गरुण चट्टी पहुंचा। वहां भोपाल के 9 यात्री मिले और तीन दिन उनके साथ ही गरुण चट्टी आश्रम में रहा। आश्रम में खाना भी मिला। चार दिन बाद शुक्रवार को सेना के हेलीकाप्टर ने फाटा उतारा। फिर सेना ने एक गाड़ी में बैठाकर गुप्तकाशी भेजा। एक दिन तथा रात राजकीय इंटर कालेज गुप्तकाशी में आर्मी के साथ बिताई। आर्मी ने खाना पानी सब कुछ दिया। सेना ने ओमप्रकाश को अतुल को अपने वाहन से बैठाकर ले जाने को कहा। ओमप्रकाश उसे हरिद्वार ले आए थे।
11 of 13
special photo gallery on kedarnath disaster
पहाड़ के बच्चे स्कूल की छुट्टियों में कहीं यात्रा मार्गों पर काफल बेचते दिखते हैं, तो कहीं होटलों में नौकरी कर अगली कक्षाओं की कापी-किताबों के लिए पैसे जुटाते हैं। 2013 के यात्रा सीजन में भी ऐसा ही हुआ। केदारनाथ में होटलों और घोड़े- खच्चर वालों के साथ इस बार भी कई छात्र बतौर मजदूर काम कर रहे थे। आपदा के बाद कुछ लोगों ने त्रिजुगीनारायण कोटी से गौरी गांव के पीछे के रास्ते जंगल में 41 शव देखे। शव काफी सड़-गल गए थे। अगस्त्यमुनि के सामाजिक कार्यकर्ता डा. कैलाश जोशी का दावा किया था कि ग्रामीणों ने त्रियुगीनारायण कोटी के जंगली रास्ते की ओर गौरी गांव के पीछे जहां-तहां 41 बच्चों के शव देखे। देखने में ये बच्चे गढ़वाली लग रहे थे। उनके पास मोबाइल से खींचे फोटोग्राफ और वीडियो फुटेज भी थे। एक बच्चा तो बचने के लिए चट्टान से लटक गया था, लेकिन उसी स्थिति में उसकी मौत हो गई। ये बच्चे 15 से 22 वर्ष के बीच के लग रहे थे।
12 of 13
special photo gallery on kedarnath disaster
पानी भर जाने से पहाड़ों में अपने ‘घरों’ से निकले भूखे कीड़े-मकोड़े अब इंसानों के शव खा रहे थे। गौरीकुंड, बदरीनाथ, रामबाड़ा में लावारिस पड़े कई शवों की आंखें गायब थीं। कई शवों के हाथ-पैर और छाती का मांस गायब था।सड़ांध पहाड़ के माहौल में समा रही थी। पहाड़ों पर सेवा कार्य करके लौटे डाक्टरों का कहना था कि स्थिति बहुत खराब थी। शवों के ऊपर शव पड़े थे। इनमें सड़ांध पैदा हो गई थी। कीड़े-मकोड़े और जानवर इन्हें खा रहे थे।
केदारनाथ से हेलीकॉप्टर से वापस आए 55 लोगों में शामिल डाक्टर प्रदीप उनियाल की सूजी आंखें, ठंड से लाल हुआ चेहरा और कानों के नीचे से उतरती त्वचा की परत बयां कर रही थी कि केदारनाथ में हालात कितने खराब थे। छह दिन और छह रातें गुजार कर लौटे इन अधिकारियों और कर्मचारियों ने जो बताया, उसने रोंगटे खड़े कर दिए थे। उनकी मानसिक स्थिति बता रही थी कि मलबे के ढेर में पटा मंदिर और केदारघाटी का खौफनाक मंजर उनके दिलो-दिमाग में घर कर गया है। दल में शामिल देहरादून के सीओ (ट्रैफिक) स्वप्न किशोर सिंह का कहना था कि रात में एक घंटी वाला खच्चर टेंट के सामने हिनहिनाता था, तो डर से सांसें थम जाती थी। न जाने कब टैंट पर हमला बोल दे। केदारनाथ में तीसरे दिन भी जब बारिश नहीं थमी तो वापसी की उम्मीद टूटने लगी थी।