स्कंदपुराण और मत्स्य पुराण के आख्यानों के अनुसार, भगवान परशुराम गंगा के पत्थरों को दिया गया वचन निभाने के लिए आज भी अमूर्त रूप में आते हैं। त्रेतायुग से द्वापर होते हुए कलयुग तक भगवान परशुराम ने यह रस्म हर वर्ष निभाई है। आकाश मार्ग से परशुराम हरकी पैड़ी से जल भरकर तत्काल वर्तमान बागपत जनपद के पुरामहादेव मंदिर पहुंचेंगे।
इस मंदिर की स्थापना परशुराम ने ही त्रेतायुग में इस वसुंधरा से अत्याचारी राजाओं का विनाश करने के बाद की थी। उन्होंने सेना विसर्जन करने से पूर्व विजयोत्सव मनाया था। इसी स्थल पर विष्णु के अवतार भगवान परशुराम ने स्वयं शिवलिंग की स्थापना की थी। इसी शिवलिंग पर जल चढ़ाने के लिए परशुराम हरकी पैड़ी स्थित ब्रह्मकुंड पहुंचते हैं।
वास्तव में परशुराम का पूरा नाम ब्रह्मणस्पति परशुराम था। उन्हीं के नाम पर हरकी पैड़ी से जिस स्थल से उन्होंने जल भरा उसका नाम ब्रह्मकुंड पड़ गया। पुरा कथाओं के अनुसार, परशुराम ने जब गंगा से एक पत्थर शिवलिंग की स्थापना के लिया तो सभी शेष पत्थर करुणकंदन करने लगे।
पत्थरों ने कहा कि, वे अपने अंश दूसरे पत्थर को स्वयं से अलग नहीं करेंगे। तब परशुराम ने आश्वासन दिया कि वे हर वर्ष शिवलिंग के रूप में स्थापित इस पत्थर पर स्वयं जलाभिषेक करेंगे। गंगा ने अपना पत्थर ले जाने दिया। तभी से करोड़ों श्रद्धालु उसी ब्रह्मकुंड से श्रावण में जल भरने आते हैं और देशभर में जलाभिषेक करते हैं।