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हावर्ड यूनिवर्सिटी के इस प्रोफेसर को हिंदी से है बेपनाह 'मोहब्बत'

Tue, 19 Jan 2016 08:31 AM IST
रमेश जोशी/ अमर उजाला, अल्मोड़ा
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हिंदीभाषी क्षेत्रों में हिंदी के साथ अन्य भाषाओं के बोलचाल में अधिकांश लोग अंग्रेजी का घालमेल कर देते हैं, पर ऑस्ट्रेलियन मूल के डॉ. रिचर्ड डिलेसी धारा प्रवाह और विशुद्ध हिंदी बोलते हैं।
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यहां तक कि फोन नंबर बताने को भी वह रोमन अंकों की बजाए हिंदी वर्तनी में अंक बताते हैं। हावर्ड विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रवक्ता डॉ. रिचर्ड कहते हैं कि विश्व अर्थव्यवस्था में भारत का महत्वपूर्ण स्थान है। ज्यादातर विकसित देश अपने युवाओं को हिंदी सीखने को प्रेरित कर रहे हैं।
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डॉ. रिचर्ड कहते हैं कि 17 वर्ष की आयु में उन्हें हिंदी भाषा सीखने की जिज्ञासा हुई। परिजनों ने उन्हें मेलबर्न विश्वविद्यालय की हिंदी कक्षा में दाखिला दिलाया। वह बताते हैं कि मेलबर्न विवि में अल्मोड़ा की रहने वाली प्रो. सुधा जोशी से उन्होंने हिंदी भाषा सीखी।

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1990 में वह पहली बार भारत पहुंचे। इसी दौरान उन्होंने भीमताल, नैनीताल और अल्मोड़ा आकर हिंदी साहित्य में अध्ययन किया। 1995 से 2004 के बीच कई बार भारत आते रहे। रिचर्ड ने शिकागो विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में पीएचडी प्राप्त की।
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2006 में हावर्ड विश्वविद्यालय बोस्टन में अंग्रेजी प्रवक्ता पद पर नियुक्त हुए। उन्होंने हिंदी सीखने के बाद हिंदी सीखने के इच्छुक विदेशी युवाओं के लिए प्राथमिक हिंदी किताब भी लिखी है। वर्तमान में वह भारत में उदारीकरण के बाद हिंदी की दशा विषय पर उपन्यास लिख रहे हैं। इसी सिलसिले में वह दो हफ्ते के भ्रमण पर भारत आए हैं।
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अमर उजाला से खास बातचीत में उन्होंने कहा कि अपनी मातृभाषा बोलने में झिझक और शर्म नहीं, अपितु गर्व होना चाहिए। भारत में अंग्रेजी के बढ़ते प्रचलन और प्रवृति को वह घर की मुर्गी दाल बराबर वाली कहावत मानते हैं। डॉ. रिचर्ड कहते हैं कि नई भाषाएं सीखना अच्छी बात है, पर मातृभाषा को नहीं छोड़ना चाहिए।
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वह कहते हैं कि उदारीकरण के बाद विश्व के देशों में भारतीय अर्थव्यवस्था की साख तेजी से बढ़ रही है। विश्व के बड़े बाजार में भारत में पहुंचने को विकसित देश अपने युवाओं को हिंदी भाषा सीखाने पर जोर दे रहे हैं। डॉ. रिचर्ड ने बताया कि हावर्ड विवि में भारतीय मूल के हिंदी भाषियों के अलावा अन्य देशों के युवा हिंदी सीख रहे हैं। पिछले एक दशक में विदेशियों में हिंदी भाषा के प्रति रुझान बढ़ा है।
(स्टोरीः रमेश जोशी/ अमर उजाला, अल्मोड़ा)
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