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हरिद्वार महाकुंभ  2021 : थानापति से लेकर कोतवाल, अखाड़ों की होती है अपनी फौज, तस्वीरें

Wed, 03 Mar 2021 02:41 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal निशांत खनी, अमर उजाला, हरिद्वार
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कोतवाल से लेकर झुंडी महंत की टोलियां शामिल - फोटो : अमर उजाला
अखाड़ों की सुरक्षा के भी अपने इंतजाम हैं। संत-महंतों की सुरक्षा हो या संपत्ति की देखरेख, इसके लिए पूरी फौज है। इनमें कोतवाल से लेकर झुंडी महंत की टोलियां शामिल हैं। त्रिशूल, भाला और खड्ग इनके हथियार हैं। शस्त्र चलाने से लेकर शास्त्रों की शिक्षा में ये पारंगत होते हैं। महाकुंभ में अखाड़ों के रमता पंचों के नगर प्रवेश के साथ कुंभ नगरी में इनका भी आगमन होता है। पेशवाई में सुरक्षा घेरा बनाकर चलते हैं और इष्टदेव एवं अखाड़ा के सर्वोच्च पदों पर आसीन संतों की सुरक्षा करते हैं। अखाड़ों की फौज का इतिहास मुगल काल से जुड़ा है। संतों के अनुसार, मुगलों ने हिंदू धार्मिक स्थलों को तोड़ा और हिंदुओं का दमन कर धर्मांतरण किया। सनातन धर्म की रक्षा के लिए अखाड़ों के संतों ने मुगलों के खिलाफ हथियार उठाए। इनमें नागा संन्यासियों की वीरता के किस्से इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं। श्री निरंजनी अखाड़े के सचिव श्रीमहंत रविंद्रपुरी बताते हैं कि समय के साथ मुगलों का साम्राज्य तो खत्म हो गया, लेकिन अखाड़ों की फौज की परंपरा आज भी है। भले ही युद्ध नहीं होते हैं, लेकिन फौज अखाड़ों की संपत्ति और संतों की सुरक्षा करती है। हर अखाड़े में थानापति, कोतवाल और जिलेदार जैसे पद हैं।

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नागा साधुओं की शोभायात्रा - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो
इनमें अखाड़ों के संन्यासी भी तैनात किए जाते हैं। उनको शस्त्र चलाने से लेकर शास्त्रों की शिक्षा दी जाती है। पेशवाई की सुरक्षा का दायित्व अखाड़ों की फौज पर निर्भर है। इनमें नागा संन्यासी सबसे अधिक होते हैं। इनकी अपनी वेशभूषा होती है। 18 साल की उम्र से अधिक काबिल लोग ही सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाते हैं।
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हरिद्वार में संत - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो
कोतवाल : श्री निरंजनी अखाड़े में 60 कोतवाल हैं। इनकी वेषभूषा संतों से अलग होती है। हाथ में चांदी की छड़ी और कंधों पर लाल शॉल इनकी पहचान है। सिर पर पगड़ी और धोती पहनते हैं। 18 साल से 40 साल की उम्र के बीच ही इनकी तैनाती होती है। 

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हरिद्वार में संत - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो
थानापति : इनकी संख्या 24 होती है। पेशवाई में लाव-लश्कर के साथ सुरक्षा की दृष्टि से चलते हैं। महाकुंभ से पहले और बाद में इनका दायित्व अखाड़े की संपत्ति (जागिरी) की सुरक्षा करना होता है। 
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छड़ी पूजन के दौरान संत - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो
जिलेदार : इनकी संख्या 21 है। अखाड़ों की देशभर में संपत्तियां होती हैं। इनमें खेतीबाड़ी काफी अधिक है। जिलेदार इनकी देखभाल करते हैं। 
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हरिद्वार में संतों का स्वागत - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो
झुंडी महंत : इनकी 25-25 संतों की टोली होती है। हर अखाड़े में टोलियों की संख्या सैकड़ों में होती है। अखाड़ों के नगर प्रवेश के साथ झुंडी महंत भी देशभर से आते हैं और महाकुंभ तक रहते हैं। पेशवाई से लेकर महाकुंभ तक संत-महंतों की सुरक्षा करते हैं। महाकुंभ के समापन के बाद सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए भ्रमणशील हो जाते हैं।
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