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कुंभ 2021: बर्फीली वादियों में 12 सालों तक मौन व्रत रखकर की कड़ी तपस्या, अब ऐसे मिली नई पहचान

Sun, 07 Mar 2021 06:22 PM IST
अलका त्यागी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हरिद्वार
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महंत धर्मराज भारती (मौनी बाबा) - फोटो : अमर उजाला
धर्मराज भारती (मौनी बाबा) को पंचायती अखाड़ा श्री निरंजनी का महंत बनाया गया है। श्रीमहंत रविंद्र पुरी और पंच परमेश्वरों की मौजूदगी में उनका पद पर सुशोभित किया गया। श्री महंत रविंद्र ने ने बताया कि अब से मौनी बाबा महंत धर्मराज भारती के नाम से पुकारे जाएंगे।   

इस मौके पर श्रीमहंत नरेंद्र गिरि ने कहा कि त्याग और तपस्या से ही परमात्मा के दर्शन होते हैं। संत हमेशा त्याग और तपस्या कर भगवान की भक्ति में लीन रहते हैं। श्रीमहंत रविंद्रपुरी ने कहा कि हमारे हजारों साधु तपस्या करते हैं। उत्तराखंड और हिमाचल सहित तमाम जगहों पर जंगलों व अलग-अलग स्थानों पर तपस्या कर रहे हैं। उन्हीं में से धर्मराज भारती हैं। धर्मराज भारती ने 12 साल तक मौन रखा। उन्होंने बर्फ से ढके दुर्गम इलाकों में 12 सालों तक कड़ी तपस्या की।  

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उनके त्याग और तपस्या को देखकर ही पंचायती अखाड़ा श्री निरंजनी ने उन्हें महंत पद पर सुशोभित करने का निर्णय लिया। श्रीमहंत रामरतन गिरि ने कहा कि त्याग और तपस्या का फल एक दिन जरूर मिलता है। इस अवसर पर श्रीमहंत ओमकार गिरि, श्रीमहंत दिनेश गिरि, श्रीमहंत हरगोविंद पुरी, श्रीमहंत केशवपुरी, श्रीमहंत मनीष भारती, श्रीमहंत राधेगिरि, श्रीमहंत नरेश गिरि आदि उपस्थि रहे।
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महंत धर्मराज भारती (मौनी बाबा) - फोटो : अमर उजाला
वहीं, इस बार कुंभ में पांच महिला समेत 23 संतों की महामंडलेश्वर पद पर ताजपोशी की जाएगी। अखाड़ा ने अनुसूचित जाति समाज के संतों के लिए दरवाजे पूरी तरह खोल दिए हैं। अनुसूचित जाति के संतों से सर्वाधिक दस महामंडलेश्वर बनाए जाएंगे।
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महंत धर्मराज भारती (मौनी बाबा) - फोटो : अमर उजाला
बता दें कि अखाड़ा का सर्वोच्च पद आचार्य महामंडलेश्वर का है, जो अभी स्वामी अवधेशानंद गिरि हैं। जूना अखाड़े के देशभर में आठ सौ महामंडलेश्वर हैं। छह हजार श्रीमहंत और लाखों महंत हैं। जबकि देश और विदेशों में बड़ी संख्या में संत जुड़े हैं।

अखाड़े हिंदू धर्म की रक्षा और सनातन धर्म के प्रचार के लिए स्थापित किए गए थे। मौजूदा समय में 13 प्रमुख अखाड़े विद्यमान हैं। इनका अपने अलग ध्वज, परंपरा और कुल गुरु हैं।
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सदियों से अखाड़ों के प्रमुख ब्राह्मण-क्षत्रिय जाति के सवर्ण संत बनते रहे हैं। लेकिन वक्त की जरूरत और संवैधानिक निर्देशों को देखते हुए अखाड़ों ने भी सोशल इंजीनियरिंग की कवायद शुरू कर दी है।
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