कुंभ महापर्व
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श्रद्धालु के रूप में राजा-महाराजा न केवल कुंभ नगरों में लंबे समय के लिए आते, बल्कि अपना राजपाट भी यहीं से चलाते थे। कुंभ वर्णन को कागजों पर आकार देने ह्वेनसांग, महंत लालपुरी, दिलीप कुमार राय, इंदिरा देवी आदि ने राजाओं से साधुओं के रिश्तों पर काफी कुछ लिखा है। साधु जब कुंभ स्नान को निकलते तब राजा महाराजा एक दिन के लिए अपने तमाम राजसी अलंकार, गहने और मुकुट साधुओं को सौंप देते।