सोमवार को राजधानी देहरादून में दिन भर रुक-रुक कर हो रही बारिश के बीच पारंपरिक पर्व हरेला की धूम रही है। यह उत्सव राज्य के कुमाऊं मंडल में मनाया जाता है। उत्तराखंड में मनाए जाने वाले पारंपरिक त्योहारों में से यह एक प्रमुख त्योहार है।
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इस पर्व में दस दिन पहले घरों में पूजा स्थान में किसी पवित्र जगह पर छोटी-छोटी डलियों में मिट्टी बिछा कर सात प्रकार के बीज (गेहूं, जौ, मूंग, उड़द, भुट्टा, गहत, सरसों आदि) बोते हैं और नौ दिनों तक उसमें पानी देते हैं।
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हर दिन शाम को पूजा के बाद इनकी गुड़ाई की जाती है और हरेले के दिन इनकी कटाई होती है। इस दिन नए पौधे लगाने की भी परंपरा है।
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हरेले के दिन घर के बड़े बुज़ुर्ग या पंडित पूजा करते हैं। हरेला की कटाई करते हैं। इस दिन कई तरह के पकवान बनते हैं। हरेले के तिनकों को देवताओं को चढ़ाने के बाद घर के सभी लोगों के सिर पर या कान पर इन तिनकों को रखा जाता है और उनकी लंबी उम्र की कामना की जाती है।
सोमवार को उत्तराखंड के विभिन्न इलाकों में यह पारंपरिक पर्व मनाया गया। राज्य में अनेक जगह लोगों और संस्थाओं द्वारा हरेला के पावन मौके पर पौध रोपण किया गया।