कांवड़ यात्रा...आस्था, अनुशासन, त्याग और समर्पण। कई किलोमीटर की पैदल यात्रा, भीषण गर्मी हो या बारिश। तप, व्रत और संयम की इस कठिन परीक्षा से हर कांवड़िया गुजर रहा है। लेकिन खास बात यह है कि इस परीक्षा में नई पीढ़ी जिसे आज कि नई भाषा में 'जेन जी' कहा जाता है, वो भी पीछे नहीं है। बदलते दौर में पीढ़ियां भले बदल रही हों, लेकिन कांवड़ यात्रा के जरिए परंपरा और संस्कार की यह डोर नई पीढ़ी तक भी पहुंच रही है।
हरिद्वार की कांवड़ यात्रा में महिला पुरुष और बुजुर्गो श्रद्धालु ही नहीं, बल्कि नई पीढ़ी भी पूरे उत्साह के साथ आस्था की इस राह पर कदम बढ़ती नजर आई। सोशल मीडिया और डिजिटल दुनिया में सबसे अधिक सक्रिय मानी जाने वाली जेन जी भगवा वस्त्र पहनकर, कई-कई किलोमीटर नंगे पांव चलकर, कंधों पर कांवड़, होंठों पर 'बोल बम' के जय घोष के साथ भगवान शिव के प्रति अपनी आस्था जाहिर करती दिखीं। इनकी कहानियों में एक बात सामने आई की कांवड़ का भार उठाते-उठाते ये पीढ़ी कहीं न कहीं अनुशासन, संयम और संकल्प का अर्थ भी समझ रही हैं।