रसोई गैस की किल्लत का असर अब कोयला और लकड़ी के बाजार पर भी साफ दिखाई देने लगा है। गैस की कमी के चलते होटल, ढाबा संचालक और हलवाई फिर से पारंपरिक साधनों की ओर लौट रहे हैं। खाना बनाने के लिए कोयले और लकड़ी के चूल्हों (भट्टियों) की मांग तेजी से बढ़ गई है।
लकड़ी व्यापारी सरदार गोविंद सिंह ने बताया कि उनकी टाल पर अब छोटे-बड़े सभी प्रकार की लकड़ी तेजी से बिक रही है। हालात यह हैं कि चीरान के बाद बचने वाले छोटे-छोटे टुकड़े भी खत्म हो जा रहे हैं। मध्यम वर्ग के लोग शाम के समय खाना बनाने के लिए लकड़ी खरीद रहे हैं, जबकि होटल और ढाबा संचालक भट्टियों के लिए लकड़ी के गुटके ले जा रहे हैं।
उन्होंने बताया कि बढ़ती मांग के बावजूद ग्राहकों को राहत देने के लिए लकड़ी अभी भी पुराने दाम 15 रुपये प्रति किलो पर ही बेची जा रही है। वहीं कोयला व्यापारी गौरव अरोड़ा ने बताया कि फिलहाल पुराने स्टॉक को पुराने रेट पर ही बेचा जा रहा है, लेकिन आने वाले दिनों में कीमतों में बढ़ोतरी तय है।
पहले 40 रुपये प्रति किलो मिलने वाला कोयला अब 50 रुपये प्रति किलो तक पहुंच सकता है। उन्होंने बताया कि बाहरी राज्यों से आने वाले कोयले के दाम बढ़ने के कारण यह वृद्धि करनी पड़ रही है। उन्होंने यह भी बताया कि हार्ड कोक कोयला, जिसका उपयोग होटलों में तंदूर के लिए होता है, 40 रुपये प्रति किलो के हिसाब से मिल रहा है, जबकि जल्दी जलने वाला चारकोल कोयला 50 रुपये प्रति किलो में बिक रहा है।