नए साल के साथ तीर्थनगरी हरिद्वार में पवित्र अर्द्घकुंभ की शुरूआत हो गई है। आइए, इस पावन मौके पर जानते हैं मांग गंगा के बहाव के पीछे छिपा ये बड़ा रहस्य...
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अर्द्घकुंभ पर जानिए, मां गंगा के बहाव के पीछे छिपा ये बड़ा रहस्य
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धार्मिक कथाओं के अनुसार राजा भागीरथ के पूर्वजों को कपिल मुनि का शाप लगा हुआ था, उन्हें उस शाप से तभी मुक्ति हो सकती थी जब मां गंगा स्वर्ग से धरती पर आएं और भागीरथ के पूर्वजों की अस्थियां उनमें समाहित हों। इस काम के लिए राजा भागीरथ ने सैकड़ों सालों तक भगवान विष्णु की तपस्या की।
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भागीरथ की तपस्या के बाद भगवान विष्णु प्रसन्न हुए और उनसे वर मांगने के लिए कहा। भागीरथ ने उन्हें अपनी परेशानी बताई और कहा कि जब तक मां गंगा धरती पर नहीं जाएंगी। तब तक भस्म हुए मेरे पूर्वजों का उद्धार नहीं होगा। भगवान विष्णु ने कहा कि ऐसा ही होगा। लेकिन आप पृथ्वी पर जाइए और देवी गंगा और भगवान विश्वनाथ का ध्यान कीजिए।
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इसके बाद राजा भागीरथ पृथ्वी पर आए और देवी गंगा की आराधना करने लगे। सैकड़ों साल गुजर गए। एक दिन मां गंगा खुश होकर प्रकट हुईं और कहा कि राजन आप किस लिए तप कर रहे हैं। राजा भागीरथ ने अपनी सारी कहानी मां गंगा को सुना दी। देवी ने कहा कि ऐसा ही होगा। लेकिन मेरे वेग को रोकने के लिए आप भगवान शिव की आराधना कीजिए क्योंकि शिव के बिना शक्ति किसी भी रूप में कहीं नहीं जा सकती।
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राजा भागीरथ ने भगवान शिव की एक हजार आठ नामों से स्तुति की। फिर भगवान शिव प्रकट हुए। राजा भागीरथ ने उनसे अपनी बात कही और भगवान शिव ने कहा कि आपका ये कार्य जरूर पूरा होगा। मां गंगा ने भागीरथ से कहा था कि जब शिव प्रसन्न हो जाएं तो आप जोर का शंखनाद करना और आपके शंख की आवाज को सुनकर मेरी धारा पृथ्वी की ओर चल पड़ेगी।
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जब ये सारी बात पृथ्वी को पता चली तो वो राजा भागीरथ के सामने प्रकट हो गई और कहा कि स्वर्ग लोक की गंगा आपकी वजह से हमारे आंचल में आ रही है। आप कुछ ऐसा कीजिए जिससे भगवती गंगा की धारा मेरे आंचल में चारों दिशाओं में फैल जाएं ताकि मैं उनकी धारा से पवित्र हो जाऊं। पृथ्वी की बात सुनकर राजा ने कहा कि जब वो महाशक्ति जल के रूप में विष्णु के चरणों से निकलकर बाहर आएं तब आप भी उनकी आराधना करना। और मैं भी उनसे प्रार्थना करूंगा।
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राजा और पृथ्वी स्वर्ग से गंगा को साथ लेने चले गए। गंगा ने कहा था कि आप मेरुश्रृंग पर्वत पर पहुंचकर शंख बजाएंगे तो उसकी ध्वनि सुनकर मैं अपनी धारा के साथ निकल पड़ूंगी। मेरुश्रृंग पर पहुंचकर राजा ऐसा ही किया, शंखनाद होते ही गंगा की तेज धारा मेरुश्रृंग पर गिरने लगती है।
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जब तक शंख की ध्वनि गूंजी गंगा की धारा तेजी से बही। जैसे ही शंख की ध्वनि शांत हुई गंगा भी शांत हो गई। और अपने वेग छोड़कर विश्राम करने लगीं। पृथ्वी इसी वक्त का इंतजार कर रही थीं। वो देवी गंगा के पास गई और प्रार्थना की। प्रार्थना से खुश होकर गंगा ने उनसे कहा कि बताइए आपको मुझसे क्या चाहिए।
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पृथ्वी ने कहा कि मेरी एक इच्छा है आप इस धरती पर चारों दिशाओं में व्याप्त होकर मेरे शरीर को पवित्र कर दीजिए। इस पर गंगा ने कहा कि मैं राजा भागीरथ की तपस्या की वजह से यहां आई हूं इसलिए उनकी इच्छा के बिना मैं कुछ भी नहीं कर सकती। इसके बाद भागीरथ शंख बजाते हुए आगे बढ़े।
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कुछ देर बाद सामने देवराज इंद्र खड़े हो गए। उन्होंने भागीरथ से कहा कि एक प्रार्थना है कि आप गंगा की एक धारा को स्वर्ग में भी बहने दीजिए। भागीरथ ने एक बार फिर मां गंगा की प्रार्थना की और गंगा की दूसरी धारा फूटी और उत्तर दिशा की ओर चली गई। स्वर्गलोक में बहने वाली गंगा की उस धारा का नाम मंदाकिनी पड़ा।
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इसके बाद भागीरथ शंख को बजाते हुए आगे चलते रहे और गंगा ध्वनि के हिसाब से उनके पीछे चलती रहीं। फिर सुमेरू पर्वत पर रास्ता मुश्किल हो गया। फिर गंगा ने कहा कि आप इस पर्वत के दक्षिण भाग में चले जाइए। वहां आप बहुत तेज स्वर में शंख बजाइए। आपकी ध्वनि के वेग के हिसाब से मैं इस पर्वत को भेदकर नीचे आ जाऊंगी और आपके पीछे पीछे चलने लगूंगी।
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अब यहां से गंगा हिमालय की ओर गईं। भगवान शिव को पता चला कि गंगा आ चुकी हैं और हिमालय पर हैं। फिर वो अपनी जटाओं का सेतु बनाकर हिमालय पर घूमने लगे और गंगा को अपनी जटाओं में समा लिया। जब गंगा शंकर की जटाओं में समाई तो वह खुशी से नाचने लगे। इसके बाद भगीरथ ने बहुत तेज ध्वनि में शंख बजाया। शंख की ध्वनि को सुनकर गंगा भगवान शंकर की जटाओं से निकलने के लिए आतुर हुई, लेकिन लंबे समय तक निकल नहीं पाई।
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फिर भगवान शिव की शरण में भागीरथ आए और कहा कि हे महादेव आप के आदेश से मैं गंगा को स्वर्गलोक से लेकर आया हूं और अब आप ने उन्हें अपनी जटाओं में समा लिया है। ऐसे में मेरे पूर्वजों का उद्धार कैसे होगा। प्रार्थना सुन भगवान शिव ने कहा कि मैं गंगा को मुक्त कर दूंगा। भगीरथ गंगा की मुक्ति की प्रतिक्षा करने लगे।
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फिर जब भगवान शिव द्वारा बताया गंगा मुक्ति का दिन आया तो भागीरथ ने शंख बजाया और भगवान शिव ने अपने जटा बंध खोल दिए। भगवती गंगा तेज गर्जना के साथ दक्षिण दिशा में भागीरथ की ओर चल पड़ीं। धरती पर उतरते ही देवी गंगा का वेग चार गुना और तेज हो गया। देवी पुराण में गंगा अवतरण की जो कथा है उसके हिसाब से भगवती गंगा भागीरथ के साथ हरिद्वार तक आईं।
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यहां पहली बार उनके स्वागत के लिए नारद समेत सप्तऋषि मौजूद थे। इन सब लोगों ने हरिद्वार में गंगा की विधिवत पूजा की इसीलिए हरिद्वार में गंगा स्नान का सबसे ज्यादा फल मिलता है। और इसीलिए हरिद्वार की कोई ऐसी सुबह नहीं होती जो गंगा पूजा के साथ शुरू नहीं होती और कोई ऐसी शाम नहीं होती जो गंगा आरती से खत्म नहीं होती।