चंपावत के देवीधुरा में शनिवार को अपराह्न 1.59 बजे शंखध्वनि बजी तो ऐतिहासिक बग्वाल (पत्थर युद्ध) के लिए तैयार सेनाएं एक दूसरे पर टूट पड़ी। तस्वीरों में जानिए बग्वाल युद्ध की खास बातें...
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जब सेनाओं ने लड़ा ऐतिहासिक बग्वाल युद्ध, आपने देखी तस्वीरें
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एक लाख से अधिक लोग इस रोमांच भरे नजारे के साक्षी बने। मंदिर के पुजारी ने 7 मिनट बाद बग्वाल बंद करने को कहा, लेकिन इसके बाद भी 3 मिनट तक जारी रहने से कुल 10 मिनट तक बग्वाल चली।
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उत्तराखंड के चंपावत जिले में स्थित छोटे से गांव देवीधुरा की पहचान देशभर में है। इस पहचान की वजह है यहां होने वाली बग्वाल। पाटी विकासखंड के इस छोटे से गांव के नाम से ज्यादा मशहूर यहां की बग्वाल है।
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बलि प्रथा से शुरू यह परंपरा कई दशकों तक पत्थर युद्ध से चलती रही। सेनाएं एक दूसरे पर पत्थर फेंकती थीं मगर हाईकोर्ट के पत्थर से युद्ध करने पर रोक लगाने के बाद 2013 से यह सफर फल-फूल तक आ पहुंचा है। मगर बग्वाल का नाम सुनने पर लोगों के जेहन में अब भी सनसनाते पत्थर की याद कौंधती है।
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कई सदी पूर्व बग्वाल की शुरुआत से पूर्व नरबलि का रिवाज था। एक बुजुर्ग महिला की मां बाराही देवी की साधना से नरबलि पर विराम लगा। इस बुजुर्ग ने अपने इकलौते बेटे की रक्षा के लिए देवी से प्रार्थना की थी, जिसके बाद बग्वाल के मौजूदा स्वरूप की शुरुआत हुई। मान्यता है कि एक व्यक्ति के बराबर खून निकलने के बाद बग्वाल बंद कर दी जाती है।
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बग्वाल में 124 बग्वाली वीर सहित कुल 149 लोग जख्मी हुए। पहली बार मुख्यमंत्री के रूप में हरीश रावत ने भी बग्वाल देखी।
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दर्शक दीर्घा में बैठे सीएम की सुरक्षा के मद्देनजर जाली लगाई गई थी। 2.10 बजे बग्वाल पर विराम लगा। चारों खामों के लोगों ने आपस में गले-मिल कुशलक्षेम पूछी।
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बग्वाल में चार खाम (चम्याल, वालिक, गहरवाल और लमगड़िया) हिस्सा लेते हैं। बग्वाल में एक व्यक्ति के रक्त के बराबर खून निकलने के बाद ही बग्वाल बंद की जाती है। इसका भान होते ही मां बाराही धाम के मंदिर के पुजारी बग्वाल रोकने का आदेश देते हैं।