देशभर के साथ उत्तराखंड में ईद-उल-अजहा (बकरीद) हर्षोल्लास से मनाई गई। देहरादून और हल्द्वानी में नमाजियों ने अमन चैन की दुआ मांगी।
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देहरादून सहित हल्द्वानी में मुस्लिम समुदाय के लोगों ने विभिन्न मस्जिदों में नमाज अता की।
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उलमा के अनुसार ईद-उल-अजहा का त्योहार मुसलमान हजरत इब्राहिम की सुन्नत अदा करने के लिए जानवरों की कुर्बानी देकर मनाते हैं। अब से 1400 पहले पैगंबर इस्लाम हजरत इब्राहिम की कोई औलाद नहीं थी।
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ऐसे में उन्होंने अल्लाह से दुआ की कि उन्हें एक नेक बेटा दे। जो उनके बुढ़ापे का सहारा बने। अल्लाह ने हजरत इब्राहिम की दुआ कबूल की। उनके यहां एक बेटे का जन्म हुआ, जिसका नाम उन्होंने इस्माइल रखा। इस्माइल जब बड़े हुए तो हजरत इब्राहिम ने एक रात सपना देखा, जिसमें उनसे कहा गया कि वह अपने इकलौते अजीज बेटे को अल्लाह की राह में कुर्बान कर दे।
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सुबह जब उन्होंने यह बात बेटे को बताई तो हजरत इस्माइल ने सिर झुकाते हुए कहा कि आप अल्लाह के हुक्म की तामील कीजिए। यह सुन हजरत इब्राहिम अपने बेटे हजरत इस्माइल को लेकर मीना की पहाड़ियों में पहुंचे।
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वहां बेटे की आंख में पट्टी बांधकर उस पर तलवार चला दी। अल्लाह को दोनों की आत्मीयता पसंद आई और उन्होंने हजरत इस्माइल को बचाकर उनके स्थान पर एक दुंबा भेड़ को भेज दिया। इसी याद में दुनिया भर के मुसलमान इस पर्व पर जानवरों की कुर्बानी करते हैं।
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इन जानवरों की होती है कुर्बानी: ऊंट पांच साल का, भैंसा दो साल का, बकरा, भेड़, दुंबा एक साल का होना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि जिस जानवर में जितना बाल होंगे, उतना सवाब मिलेगा। इस लिए लोग अधिक बाल वाले और सुंदर दिखने वाले जानवरों की कुर्बानी करते हैं।
कुर्बानी के बकरों की खरीदारी को इनामुल्ला बिल्डिंग, मुस्लिम कॉलोनी, आजाद कॉलोनी में जगह-जगह अस्थायी पैठ लगी है। यहां सामान्य बकरों की कीमत 10 से 15 हजार रुपये है। जबकि कई बकरों की कीमत 50 हजार से एक लाख तक भी है। कई लोग मक्का, दुबई से लाखों की कीमत के दुंबे भी लाए हैं। जो देखने में खूबसूरत और भारी हैं।