युद्ध से पहले दोनों गांव के लोगों ने थाती-माटी और गांव के कुल देवता बत्तिसर देव की पूजा की। जिसके बाद दोनों सगी बहनों की घास-फूस की प्रतिमा को क्याणी डांडा स्थित कुएं में ढोल-दमऊ की थाप के साथ विसर्जित किया गया। प्रतिमाताओं के विसर्जन के बाद दोनों गांव के लोगों ने एक दूसरे के ऊपर गागली के डंठल फेंके। महिलाओं और पुरुषों ने सामूहिक हारुल, तांदी, रासो और झेंता नृत्य किया।