मानवाधिकार आयोग और सर्वोच्च अदालत के दबाव के बाद पुलिस ने थानों में थर्ड डिग्री का इस्तेमाल दिखाने के लिए तो बंद कर दिया है, लेकिन इसका इस्तेमाल अब भी किया जा रहा है। सोमवार को देहरादून जिले के सहसपुर थाना क्षेत्र की धर्मावाला चौकी में पट्टे से किसान की पिटाई पुलिस की इसी सच्चाई को सामने लाने का उदाहरण भर है।
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थर्ड डिग्री टॉर्चर के हथियारों के नाम पढ़कर लोट-पोट हो जाएंगे
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सूत्रों के अनुसार, पुलिस को किसी भी आरोपी से मनमाफिक बात कबूलवाने का यह कारगर तरीका लगता है। पुलिस ने इस पट्टे का नाम समाज सुधारक दिया है। पट्टे का खौफ इतना है कि कई बार निर्दोष भी पुलिस का कहना मान लेता है।इसे अलग-अलग नाम से पुकारा जाता है। (समाज सुधारक, ज्ञानवर्द्धक पट्टा, आन मिलो सजना, बच्चों की याद आ रही है, रात की रानी, राजा, फिर कब मिलोगे)
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एक समय था जब उत्तर प्रदेश में कई दारोगाओं की पहचान ही पट्टे वाला दारोगा के रूप में होती थी। पुलिस के पुराने दिग्गज पट्टे का इस्तेमाल आरोपी के हाथ और पैरों के तलवे की पिटाई में करते हैं। इनका मानना है कि शरीर के इन हिस्सों में की गई पिटाई के मेडिकल में पकड़े जाने की आशंका कम रहती है। कमर और जांघों के ऊपर पिटाई आसानी से पकड़ में आ जाती है।
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पट्टा 200 से 250 रुपए में बन जाता है। लकड़ी की हत्थे में दो नट-बोल्ट से आटा चक्की का पट्टा फिट कर दिया जाता है। किसी शख्स से पूछताछ के दौरान पेट और घुटनों के बीच लकड़ी का बना बेलन रखकर दोनों तरफ सिपाही खड़े हो जाते हैं। सिपाही बेलन को पैरों से आगे पीछे करते हैं। इससे नसों में खिंचाव के कारण असहनीय दर्द होता है और आरोपी चीखने के साथ ही बोल पड़ता है।
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पानी पिलान- जिस शख्स से पूछताछ करनी हो, उसे उल्टा लटका दिया जाता है। एक सीमा के बाद बडे़ से बड़ा शातिर सीने में छिपे राज को बताने के लिए मजबूर हो जाता है। कंबल परेड - इसमें आरोपी की हवालात के कंबल में लपेट कर पिटाई की जाती है। इससे शरीर पर निशान पड़ने की आशंका ना के बराबर रहती है। नाखून निकालना - थर्ड डिग्री का यह सबसे बेरहम तरीका है। (स्टोरी/फोटोः राकेश शर्मा)