ईसाइयों का सबसे बड़े त्योहार क्रिसमस पर प्रभु यीशु के जन्मदिवस देशभर में धूमधाम से सोमवार को मनाया जाएगा। लेकिन क्या आपको पता है कि सेंटा इस दिन लाल कपड़े ही क्यों पहनता है।
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Jesus Painting
क्रिसमस क्राइस्ट्स और मास दो शब्दों को मिलकार बना है। इसमें क्रिस का मतलब जीसस क्राइस्ट और मस का मतलब प्रार्थना करता हुआ ग्रुप है।
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- फोटो : amar ujala
ईसाई संत निकोलस किसी गरीब को पैसे की कमी के कारण क्रिसमस मनाने से वंचित नहीं देख सकते थे। इसलिए वह लाल कपड़े पहनकर, चेहरे को दाढ़ी से ढक गरीबों को खाने की चीजें और गिफ्ट बांटते थे। तभी से सेंटा क्लाज का यह रूप सामने आया।
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christmas
- फोटो : amar ujala
लाल रंग जीसस क्राइस्ट के रक्त का प्रतीक है। जीजस हर ईसाई को अपनी संतान समझते थे और उन्हें बिना शर्त प्यार करते थे। लाल रंग के जरिये वह सबको मानवता का पाठ पढ़ाना चाहते थे। उनका कहना था कि लाल खुशी का रंग है।
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- फोटो : लाल सिंह
क्रिसमस ट्री को सजाने की शुरुआत जर्मनी से हुई थी। माना जाता है कि मार्टिन लूथर नामक शख्स की निगाह बर्फ से ढके फर के पेड़ों पर पड़ी, जो बेहद खूबसूरत लग रहे थे। वह कुछ पौधे घर लाए और उन्हें कैंडल्स से सजाया। ट्री में घंटियां बुरी आत्माओं को दूर रखने और अच्छाइयों को लाने के लिए परी और फेयरी की मूर्तियों लगाई जाती हैं।
अक्सर बच्चे गिफ्ट लेने के लिए 24 दिसंबर की रात अपने पास सॉक्स रखकर सोते है। लेकिन सेंटा से गिफ्ट पाने के लिसे सॉक्स ही क्यों रखा जाता है, इसकी एक कहानी है। कहा जाता है कि एक गरीब की तीन बेटियां थीं, जिनकी शादी के लिए उसके पास पैसे नहीं थे। सेंटा ने उन लड़कियों के सॉक्स में सोने के सिक्के भर दिए। तभी से बच्चे 24 दिसंबर की रात अपने पास सॉक्स रखकर सोते हैं।