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लोग पहचान न सकें, इसलिए वेश बदलकर घूमते थे अटल बिहारी, उनकी अनकही 10 रोचक बातें...

Sat, 18 Aug 2018 10:30 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
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atal bihari vajpayee
हमेशा धोती, कुर्ते में नजर आने वाले पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी मसूरी पहुंचते ही वेशभूषा बदल लेते थे। मसूरी में वे अक्सर पैंट-कमीज पहनकर घूमा करते थे, ताकि लोग उन्हें पहचान न सकें। प्रधानमंत्री बनने से पहले और बाद में वे कई बाद मसूरी आए।
 
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मसूरी से विशेष लगाव रखने वाले वाजपेयी हफ्तों तक मसूरी में प्रवास करते थे। मसूरी होटल एसोसिएशन के अध्यक्ष आरएन माथुर ने बताया कि पहली बार जब उन्होंने वाजपेयी को देखा तो पहचान नहीं पाए। हमेशा धोती, कुर्ते में रहने वाले वाजपेयी मसूरी की सड़कों पर पेंट-कमीज पहनकर घूम रहे थे। उन्होंने किताबघर स्थित दुकान से कुछ दवाएं खरीदी। दुकान स्वामी स्व. अशोक कुमार ने कहा कि उनकी शक्ल अटल बिहारी वाजपेयी से मिलती-जुलती है। इस पर उन्होंने खुद बताया था कि वे अटल ही हैं।
 
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अशोक कुमार ने आरएन माथुर को वाजपेयी के मसूरी में होने की सूचना दी। माथुर ने उन्हें लायंस क्लब के समारोह में मुख्य अतिथि बनने का न्योता दिया। निजी दौरे पर होने के कारण वाजपेयी ने मना कर दिया, लेकिन बाद में मान गए। वाजपेयी मसूरी में कैंपटी फॉल रोड स्थित एकांत भवन में कई दिनों तक ठहरकर वहां की खूबसूरती का आनंद उठाते थे। एकांत भवन के केयर टेकर चंदन सिंह ने बताया कि एक बार वाजपेयी ने उन्हें अपना टेलीफोन नंबर देते हुए कहा था कि भविष्य में कभी मेरी जरूरत हो तो फोन कर लेना।
 

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देश में जब इमरजेंसी लगी तब और इमरजेंसी खत्म होने के बाद पार्टी को मजबूत करने के लिए पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी का समय-समय पर रुड़की आना लगा रहा। बिजली विभाग से रिटायर्ड राजकुुमार शर्मा ने बताया कि उनके बड़े भाई स्वर्गीय बृजभूषण शर्मा रुड़की मंडल के भाजपा अध्यक्ष थे। वर्ष 1982 के आसपास अटल जी उनके चंद्रपुरी स्थित पुराने घर में आए थे। बृजभूषण शर्मा उस समय बीएसएम कॉलेज में अंग्रेजी के शिक्षक थे और पक्के जनसंघी थे। हरिद्वार से लौटते समय जब अटलजी घर आए थे तो उनके यहां लोगों का भारी जमावड़ा लग गया। उनके पहुंचने पर जब जलपान के लिए कहा गया तो अटल जी ने बृजभूषण शर्मा के कान में धीरे से कहा कि ‘जल मैंने पी लिया है और पान मैं खाता नहीं हूं’। 
 
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अपने काम के प्रति अटल बिहारी वाजपेयी इस कदर समर्पित थे कि बड़े से बड़े ओहदे पर होने के बाद भी उन्होंने कभी सुविधाओं की ओर मुंह नहीं ताका। काम के समय उन्हें स्कूटर मिला तो स्कूटर से घूमे और बस या ट्रेन छूट गई तो वह ट्रक में सवार हो गए। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट ने बताया उन दिनों हल्द्वानी से रात्रि बस सेवा नहीं थी। वाजपेयी जी पहाड़ से यात्रा कर जब हल्द्वानी पहुंचे तो दिल्ली की बस छूट चुकी थी। रात में कोई और बस नहीं थी। उन्हें हर हाल में पार्टी बैठक में शामिल होना था। वे दिल्ली जा रहे एक ट्रक में सवार हो गए।
 
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जनसंघ के प्रमुख लोगों में शुमार स्व. त्रिलोक चंद्र डाबर के यहां अटलजी का खासा आना-जाना था। उनके पुत्र विश्वास डाबर ने बताया कि अटलजी देहरादून आते थे तो उनके पिताजी के पास जरूर रुकते थे। अटलजी को चाट खाने का बहुत शौक था। 1981 में अटलजी देहरादून आए तो उनके घर पर ही रुके थे। अचानक उन्होंने इंद्रसेन की अपनी पसंदीदा चाट खाने की इच्छा व्यक्त की। डाबर ने कहा कि वह पैदल ही अटलजी को लेकर तिलक रोड स्थित इंद्रसेन की चाट की दुकान पर पहुंचे। वहां बहुत भीड़ थी। मैंने इंद्रसेन से कहा कि उनके साथ अटलजी आए हैं। चाट पहले खिला तो। इस पर इंद्रसेन ने कहा कि अगर इंदिरा गांधी खुद भी आ जाएं तो भी चाट तो नंबर से ही खिलाऊंगा। इस पर अटलजी बहुत तेजी से हंसे और उन्होंने लाइन में लगकर ही अपनी पसंदीदा चाट खाई।
 
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अटलजी का देहरादून निवासी स्व. नित्यानंद स्वामी के प्रति खासा स्नेह था। स्वामी के दामाद सुनील हरव्यासी ने बताया कि उनके ससुर 1969 से 73 तक जनसंघ के टिकट पर विधायक रहे थे। 73 के चुनाव में टिकट बांटने को लेकर एक बैठक देहरादून में ही हुई थी। उस समय नारायण देशमुख ने अटलजी की मौजूदगी में ही स्वामी को टिकट देने का विरोध किया। अटलजी इससे खासे क्षुब्ध हुए और बैठक छोड़कर चले गए। सुनील कहते हैं कि अटलजी ने राज्य बनाया तो उन्होंने ही नित्यानंद स्वामी को पहला मुख्यमंत्री बनाया। अटलजीजी उस वक्त प्रधानमंत्री थे। 
 

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उत्तराखंड का सीएम बनने के बाद अटली से मिलने के लिए नित्यानंद स्वामी दिल्ली गए थे। इस मुलाकात के समय स्वामी के मुख्यमंत्री रहते उनके राजनीतिक सलाहकार रहे संजय चतुर्वेदी भी उनके साथ थे। संजय कहते हैं कि अटलजी ने उस वक्त स्वामी जी से कहा कि आपके कद के लिहाज से मुख्यमंत्री का यह पद छोटा है। लेकिन नया राज्य बनाया है ऐसे में वहां ज्यादा काम करने की जरूरत है। आप निश्चिंत होकर राज्यहित के काम करते रहें। संजय बताते हैं कि अटलजी ने उस वक्त इतना सम्मान दिया कि लग ही नहीं रहा था कि वे लोग देश के प्रधानमंत्री से मिल रहे हैं।
 
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अलग राज्य बनाने के बाद भी राज्य के पहले विधानसभा के चुनाव में भाजपा को शिकस्त मिली। 2007 के विस चुनाव से पहले ही अटलजी ने खुद के प्रधानमंत्री रहते भू-तल परिवहन मंत्री के रूप में स्वर्णिम चर्तुभुज योजना (हर राज्य की राजधानी को देश की राजधानी से फोर लेन सड़क से जोड़ने की योजना) पर बेहतरीन काम करने वाले मेजर जनरल (से.नि.) भुवन चंद्र खंडूड़ी के आगे कर दिया। अघोषित रूप से उन्हीं के नेतृत्व में भाजपा ने उत्तराखंड में विस का चुनाव का लड़ा। गठबंधन करके भाजपा की सरकार बनने की नौबत आई तो अटलजी ने ही खंडूड़ी को मुख्यमंत्री बनवाया। खंडूड़ी उस वक्त विधायक भी नहीं थे।
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