अभी तक आपने इंसानों में दुश्मनी होने की बात सुनी होगी। लेकिन आज हम आपकों पेड़-पौधों की दुश्मनी के बारे में बता रहे हैं।
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एक शताब्दी से अधिक समय के बाद उत्तराखंड और दूसरे हिमालयी क्षेत्रों में साल के पौधों और बीजों को पनपने नहीं दे रही ‘शत्रु’ वनस्पतियों की पहचान कर ली गई है।
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इन वनस्पतियों में तीन विदेशी आक्रांता हैं और एक देसी। साल के जंगलों में जड़ जमाए इन वनस्पतियों के जहरीले रसायनों की वजह से साल की गुणवत्ता घट रही है। इन शत्रु वनस्पतियों की पहचान होने के बाद इन्हें साल के जंगलों से बेदखल करने की कार्ययोजना बनाई जा रही है।
साल के वृक्ष वैसे तो पूरे देश में हैं, लेकिन हिमालयी क्षेत्र में साल के जंगलों की अधिकता से इनकी अहमियत अधिक है। साल से इमारती लकड़ी और रसायन निकाले जाते हैं।
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साल से व्यावसायिक गतिविधियां जुड़ी हैं। कई वर्षों से इस वृक्ष की गुणवत्ता और पैदाइश में आ रही कमी ने वन विज्ञानियों को परेशानी में डाल दिया था। साल को नुकसान किन कारणों से हो रहा है? वन विज्ञानी इसकी खोज उन्नीसवीं शताब्दी से कर रहे हैं।
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वन अनुसंधान संस्थान (एफआरआई) के ताजा शोध में साल को नुकसान पहुंचाने वाली चार वनस्पतियों को चिह्नित कर लिया गया है। रिपोर्ट में बताया गया कि शत्रु वनस्पतियों में एक आर्डिशिया देसी है और लैंटाना, यूपीटोरियम, एजीलेटम विदेशी आक्रांता वनस्पतियों की श्रेणी में आती हैं।
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खरपतवार की शक्ल की ये तीनों वनस्पतियां पश्चिमी देशों से आई हैं। शत्रु वनस्पतियां एलीलो रसायन छोड़ती हैं। इससे बीज पनप नहीं पनपते। इसके अलावा साल के पौधों के पत्तों, जड़ों को नुकसान पहुंचता है और इनका विकास बाधित हो जाता है। विज्ञानियों ने इन चार के अलावा 10 और वनस्पतियों पर परीक्षण किया था, लेकिन वे साल के लिए नुकसानदेह नहीं निकलीं।
साल के वृक्षों के जेनरेशन में आ रही कमी के कारण उन्नीसवीं शताब्दी से खोजे जा रहे हैं। साल को नुकसान पहुंचाने वाली चार वनस्पतियों को चिह्नित कर लिया गया है। इनमें तीन विदेशी मूल की हैं। इनके एलीलो केमिकल साल के लिए नुकसानदेह हैं।
- डा. ओमवीर सिंह, शोध टीम लीडर और वरिष्ठ विज्ञानी, एफआरआई