अमर उजाला की पहल जीवांजलि : विचारों से बदलाव तक के तहत सोमवार को ग्राफिए एरा के सिल्वर जुबली कन्वेंशन सेंटर में कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इसमें आध्यात्मिक कथावाचक जया किशोरी ने जीवन, संस्कार, परिवार, युवाओं, सफलता और अध्यात्म से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि संस्कार, संयम, संवेदनशीलता, भक्ति और अध्यात्म बुढ़ापे के लिए नहीं हैं। हमारे यहां संस्कार बचपन में सिखाए जाते हैं। कल क्या होगा, हमें नहीं पता, लेकिन हम अपनी जिंदगी के महत्वपूर्ण काम भविष्य के लिए छोड़ देते हैं।
उन्होंने कहा कि हमने अपने काम को ही अपनी दुनिया बना लिया है। युवाओं को लगता है कि अच्छे नंबर नहीं आए तो जिंदगी खत्म हो गई। जबकि नंबर पढ़कर आते हैं, किसी भी तरह के जाेड़ तोड़ से नहीं आते। नंबर के साथ हमें चरित्र, व्यक्तित्व और संवाद कौशल को बेहतर बनाने पर काम करना होगा। जया किशोरी ने परिवार में घटते संवाद पर चिंता जताते हुए कहा कि परिवार का मूल्यवान समय अब एक साथ फोन देखने या रील देखने तक सीमित हो गया है। हर घर का यह नियम होना चाहिए कि सप्ताह में एक बार दो-तीन घंटे के लिए सभी साथ बैठें और किसी एक विषय पर बात करें। उस दो-तीन घंटे की बातचीत में भूल जाना चाहिए कि आपका रिश्ता क्या है।
लेकिन अब हम किसी विषय पर बात ही नहीं करते। उन्होंने कहा कि आजकल लोग कहते हैं कि मेरी इंसानों से नहीं बन रही। इसकी वजह यह है कि हमने मशीनों के साथ इतना समय बिताना शुरू कर दिया है कि अब हमारा धैर्य कम हो रहा है। लेकिन प्रकृति, रिश्ते, अध्यात्म और व्यक्तित्व ऐसा नहीं करते। इन्हें बनाने में समय लगता है, लेकिन हम समय नहीं दे रहे हैं। कार्यक्रम के अंत में उन्होंने लोगों के सवालों के जवाब भी दिए।