क्रिकेट के किसी भी फॉर्मेट में मुकाबले का नतीजा काफी हद तक पिच या विकेट पर भी नर्भर करता है। आइए आपको बताते हैं किस तरह से और कितने दिन में तैयार होती है क्रिकेट की एक पिच। पिच तैयार करने के दो पहलू होते हैं-
विकेट का निर्माण और विकेट की तैयारी पहले जानते हैं विकेट का निर्माण आखिर किस तरह से होता है ? किसी भी नए विकेट को तैयार होने में करीब दो साल का समय लगता है। इसे तैयार करने में पारंपरिक तरीकों के अलावा विज्ञान की भी भागेदारी रहती है।
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अच्छी विकेट के लिए गाद और रेत जरूरी
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अच्छी विकेट बनाने के लिए जिस मिट्टी की आवश्कता होती है, उसमें क्ले की मात्रा 50 से 70 प्रतिशत होनी चाहिए। इसके अलावा उसमें सिल्ट यानी गाद और रेत भी होना आवश्यक है। इन दोनों का भी सही अनुपात में होना जरूरी है। ये मापदंड आईसीसी द्वारा रखे जाते हैं। भारतीय पिचों के स्लो होने का मुख्य कारण क्ले की मात्रा कम और सिल्ट की मात्रा जरूरत से दस गुना ज्यादा होना है।
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IIT जैसे संस्थान देते है मिट्टी की जानकारी
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पहले जहां स्टेडियम होता था उसके 5-10 किलोमीटर के दायरे में ही ऐसी मिट्टी की खोज की जाती थी। लेकिन पिछले कुछ सालों से तकनीक के इस्तेमाल से तरीका बदल गया है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और आईआईटी मुंबई प्रत्येक राज्यों की मिट्टी,
उसमें पाए जाने वाले खनिज पदार्थ और उनकी जगह की जानकारी मुहैया कराती है, जिससे बीसीसीआई को बड़ी मदद पहुंची है। भारतीय क्रिकेट बोर्ड के पास अब 250 के करीब बेंचमार्क मिट्टी के नमूने हैं जिनसे विदेशी पिचों के टक्कर की विकेट तैयार की जा सकती है।
विकेट का निर्माण
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जब कोई नई विकेट तैयार की जाती है तो उसमें दो या तीन लेयर डाली जाती है। ऊपरी लेयर जिसे 'प्लेइंग सरफेस' भी कहते हैं, उसमें 8-12 इंच की मोटी क्ले की पट्टी बनाई जाती है। दूसरी लेयर 8 इंच की होती है, जो दो भागों में बांटी जाती है। पहले 4 इंच में रेत ठोस करने के बाद दूसरे 4 इंच में बलुई मिट्टी डाली जाती है। ये लेयर उपसतह जल निकासी का काम करती है।
पहले जल निकासी लेयर की उपयोगिता पर ध्यान नहीं दिया जाता था। इसके नुकसान मैच के दिन देखने को मिलता था। मैच से पहले जब विकेट को पानी दिया जाता था तो वो पानी प्लेइंग सरफेस और जल निकासी लेयर के बीच जम जाता था। इससे मैच के दौरान वो जमा हुआ पानी वाष्प के रूप में प्लेइंग सरफेस की तरफ बढ़ता था। इससे विकेट की डेन्सिटी प्रभावित होती थी और वो धीमा हो जाता था। इसका ज्यादा नुकसान टेस्ट मैचों में देखने को मिलता था।
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प्लेइंग सरफेस की क्ले
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जिस जगह विकेट बिछाना होता है, उसे पहले समतल कर लिया जाता है। फिर उस पर 4 इंच रेत डालकर उसे ठोस किया जाता। उस पर 4 इंच की बलुई मिट्टी डाली जाती है। इसे भी प्लेट वाइब्रेटर की मदद से ठोस किया जाता है।
आखिर में प्लेइंग सरफेस की क्ले बिछाई जाती है जो 8-12 इंच की परत होती है। हालांकि क्ले सीधे बाहर से लाकर नहीं बिछाई जाती। पहले उसके छोटे छोटे संघ काटे जाते हैं और धूप में सुखाए जाते हैं। इस क्ले की 20-25 मिलीमीटर की एक-एक लेयर प्लेइंग सरफेस पर डाली जाती है। ये करीब 5 इंच तक पानी और रोलर की मदद से बैठाई जाती है।
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बरमूडा सेलेक्शन-1 वेरायटी
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5 इंच क्ले की सरफेस के बाद घास को रोका जाता है। उस घास को 2-3 हफ्ते तक उगने दिया जाता है। फिर क्ले की 5-5 मिलीमीटर के संघ घास के साथ लेयर किए जाते हैं। यानी ऊपर की 3 इंच की लेयर, क्ले और घास को साथ-साथ रखकर तैयार की जाती है।
तभी जाकर टर्फ विकेट मिलता है। घास की जड़ों को पूरी तरह उगने में सालभर लगता है। ये खास तरह की घास, बरमूडा सेलेक्शन-1 वेरायटी होती है। इसकी जड़े 150 से 200 एमएम नीचे उगती हैं। जड़े नीचे जितनी अच्छी तरह मिट्टी के साथ बंधेंगी, विकेट उतना ही अच्छा तैयार होगा।
मैच से पहले विकेट की तैयारी में सबसे अहम बात ध्यान में रखी जाती है कि क्रिकेट किस फॉर्मेट में खेली जानी है। इसके अलावा मौसम का पूर्वानुमान भी जरूरी है। अगर टेस्ट मैच के लिए विकेट तैयार करना है तो करीब 2 हफ्ते पहले से तैयारी की जाती है। वनडे के लिए करीब 5-7 दिन और टी-20 में 3-4 दिन की जरूरत होती है।