नेताजी सुभाषचंद्र बोस तथा ‘जय श्रीराम’ पर राजनीति ममता दी को असहज करने वाली है
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यहां बड़ा सवाल यह है कि ‘मां, माटी और मानुष’ के नारे के साथ पश्चिम बंगाल में सत्ता में आई ममता ‘जय श्रीराम’ के नारे से इतना क्यों बिचकती हैं? वो चाहती तो नारेबाजी के बावजूद नेताजी स्मरण कार्यक्रम में अपनी बात दमदारी से रख सकती थीं। चंद लोगों की नारेबाजी से क्या फरक पड़ता? ममता ने सरकारी आयोजन में ‘जय श्रीराम’ के नारे लगाने पर भी सवाल उठाया। लेकिन ये सवाल अब बेमानी है, क्योंकि देश का प्रधानमंत्री स्वयं राम मंदिर का भूमि पूजन कर सकता है और बहुसंख्य जनता को इसमें कुछ भी गैर नहीं लगता तो सरकारी आयोजन में भी ‘जय श्रीराम’ कहना गलत कैसे हो गया? इसके बाद भी ममता ने सभा को तजना सही समझा तो इसके पीछे सोच यही है कि वह श्रीराम के राजनीतिक उपयोग के खिलाफ हैं।
भगवान श्रीराम के प्रति अडिग आस्था से हटकर देखें तो भाजपा ‘जय श्रीराम’ के जयघोष का उपयोग कई तरीकों से करती है। कभी वह हिंदुत्व के वर्चस्व का प्रतीक होता है तो कभी निर्णायक विजय का। कहीं वह गहरे कटाक्ष के रूप में तो कहीं चिढ़ाने के अंदाज में भी इस्तेमाल किया जाता है, जैसा कि ममता ने अपने भाषण के दौरान महसूस किया। वो मानती हैं कि यह नारेबाजी भगवान राम के प्रति अपनी अटूट आस्था का प्रदर्शन न होकर ममता को चिढ़ाने की कोशिश ही थी।
इसकी मुख्य वजह है कि पश्चिम बंगाल में ‘जय श्रीराम’ को एक आयातित आराध्य और नारे के रूप में पेश करने की कोशिश की जा रही है। टीएमसी बार यह जताने की कोशिश करती है कि राम मूलत: हिंदी पट्टी के धार्मिक देवता हैं कि बंगाल के। बंगाली शाक्तपंथी हैं और राम ने भले शक्तिपूजा की हो, लेकिन बंगालियों के आस्था बैंक में भक्ति के ज्यादातर डिपाजिट देवी के नाम पर हैं। यह स्थिति राम की नहीं हो सकती, भले ही भाजपा भगवा कोशिशें कितनी ही कर ले। ममता दी ने जय श्रीराम की प्रतिस्पर्द्धा में ‘जय हिंद, जय बांगला’ नारा प्रचलित किया है।
लेकिन भाजपा अपनी ‘जय श्रीराम’ की टेक पर कायम है। उसका मानना है कि राम की आराधना में ही शक्ति की आराधना निहित है। कहीं कोई टकराव नहीं है। है भी तो केवल राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का। अगर दीदी श्रीराम से दूरी बनाए रखती हैं तो भाजपा को फायदा ही होगा। भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने ममता के रवैये पर अपनी तल्ख प्रतिक्रिया में कहा कि किसी के स्वागत में लगाया गया ‘जय श्रीराम’ का नारा भी ममताजी को अपमान लगता है। यह किस तरह की राजनीति है?
दरअसल नेताजी सुभाषचंद्र बोस तथा ‘जय श्रीराम’ पर राजनीति ममता दी को असहज करने वाली है। दीदी इसका न तो खुलकर समर्थन कर सकती है और न ही इसका स्पष्ट रूप से विरोध कर सकती हैं। दोनो के अपने राजनीतिक खतरे हैं। क्योंकि ममता के कार्यक्रम छोड़कर जाने से राज्य के बहुसंख्य हिंदुओं में संदेश गया कि ममता ‘श्रीराम’ को भी नहीं मानती जबकि अल्पसंख्यकों में मैसेज गया कि दीदी ‘हिंदुत्व विरोध’ के मामले में कोई समझौता नहीं करती। वो कभी भाजपा के साथ नहीं जाएंगी। क्योंकि ‘जय श्रीराम’ कहना भाजपाई होना है। यहां नेताजी की भी दो व्याख्याएं हैं।
भाजपाई नजर में नेताजी घोर राष्ट्रवादी थे। अंग्रेजों को हराने के लिए उन्होंने हर संभव रास्ता अपनाया। जबकि गैर भाजपाइयों की नजर में नेताजी हिंदू होते हुए भी सेक्युलर और सर्व धर्म समभावी थे। वो देश को तोड़ना नहीं, जोड़ना चाहते थे। उधर सरदार पटेल के बाद नेताजी ऐसे दूसरे कांग्रेसी महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हैं, जिन्हें भाजपा अपनी विचारधारा का प्रतिनिधि मानती है। उधर भाजपा के इस नवोदित नेताजी प्रेम के जवाब में ममता ने राज्य में ‘आजाद हिंदी फौज’ का स्मारक बनाने का ऐलान कर डाला है।
जाहिर है कि नेताजी के पुण्य स्मरण के बहाने हुई राजनीतिक जोर आजमाइश में भाजपा और ममता दोनो ने ही अपने अपने वोट बैंक को पक्का किया है। अक्सर होता यह है कि महापुरूषों के विचार कालांतर में अपने हिसाब राजनीतिक चाशनी में लपेट कर पेश किए जाने लगते हैं। मूल विचारों की व्याख्या वर्तमान की सुविधा से की जाने लगती है। अब नेताजी के साथ भी यही हो रहा है। देखना यह है कि पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव के बाद नेताजी को सियासी दल किस रूप में याद रखते हैं। रखते भी हैं या नहीं..?
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