मुंबई में कैलाश खेर की आवाज को धीरे धीरे लोग पहचानने लगे थे
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'अल्लाह के बंदे' ने दिलाई पहली बड़ी शोहरत
मुंबई में धीरे-धीरे मेरी आवाज को लोग पहचानने लगे थे। बात साल 2003 की है। संगीतकार विशाल शेखर फिल्म 'वैसा भी होता है' के लिए संगीत दे रहे थे।
विशाल का फोन आया तो मैंने पहले यही समझा कि विशाल भारद्वाज ने फोन किया है। खैर हम मिले। विशाल शेखर ने मुझसे 'अल्लाह के बंदे' गीत गवाया। फिल्म तो नहीं चली लेकिन अकेले इस गाने ने घर-घर पहचान बना दी।
इसके बाद 'स्वदेस' का गाना ‘यूं ही चला चल हो’ या 'मंगल पांडे' का गाना ‘मंगल मंगल हो’ सबने मेरी मदद की और सिलसिला चल निकला। इन दोनों फिल्मों में गुणी संगीतकार ए आर रहमान ने मेरी आवाज के साथ कामयाब प्रयोग किए। रहमान साहब की मां करीमा बेगम मुझे अपना छोटा बेटा मानती थीं। मैं जब भी उनके घर जाता वह अपने हाथ से खाना बनाकर खिलाती थीं।
पहला सोलो अलबम ‘कैलासा’
थोड़ा पीछे जाकर अगर अपने संघर्ष के दिनों की कुछ बातें साझा करना चाहूं तो मेरा पहला अलबम साल 2006 में सोनी म्यूजिक कंपनी ने 'कैलासा' रिलीज किया। मैंने अपने संघर्ष के दिनों में कई म्यूजिक अलबम बनाए लेकिन उस समय कोई भी म्यूजिक कंपनी मेरे अलबम को रिलीज नहीं करना चाह रही था। और जैसे ही गाने हिट हुए तो यही कंपनियां मुझे बुला बुलाकर गाने देने लगीं।
गाने के वीडियो में भी मैं दिखा और मेरा मानना है कि किसी भी म्यूजिक वीडियो के सुर ताल और दृश्यों के बीच तारतम्यता बेहद जरूरी है।
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