जिस समाज में नवरात्र में पूजन के लिए कुमारियों की खोज होती है। सीता, सरस्वती, दुर्गा और लक्ष्मी को देवी के रूप में पूजते हैं। कन्यादान को सबसे बड़ा दान माना गया है जिसके बिना स्वर्ग और मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती। उसी समाज का मिजाज कोख में कन्या की जानकारी होते ही आदिम बन जाता है।
भौतिक सुख की उत्तरोत्तर बढ़ती अभिलाषा ने मनुष्य को इतना अंधा बना दिया है कि वह आज अपने ही अजन्मे शिशु की गर्भपात द्वारा हत्या करता जा रहा है। संसार के किसी भी धर्म में भ्रूण-हत्या को श्रेष्ठ नहीं बताया गया है। आश्चर्य है कि धार्मिक कहलाने वाला समाज, चींटी की हत्या से कांपने वाला समाज आंख मूंद कर कैसे भ्रूण-हत्या करवाता है।
हमारे देश की इन्दिरा गांधी, मैरी कॉम, सुषमा स्वराज, साइना नेहवाल, हरमनप्रीत कौर, कल्पना चावला, सुनीता विलियम्स, इंदिरा नुयी, मीराबाई चानू अपने-अपने क्षेत्र में दुनिया में लोहा मनवा चुकी हैं। बावजूद इसके देश में हर वर्ष लगभग 2 लाख कन्याओं की गर्भ में ही हत्या हो रही है।
कहा जाता है कि ‘‘किसी समाज की सभ्यता का अनुमान उस समाज में स्त्री को दिए गए आदर द्वारा आंका जा सकता है।’’ मानव समाज के समुचित और सर्वांगीण विकास में महिलाओं का योगदान कभी भी कम नहीं रहा है परन्तु यह एक विडम्बना ही रही है कि समाज में उन्हें बराबरी का दर्जा शायद ही कभी प्राप्त हुआ हो। वेदों में कहा गया है कि ‘‘यत्र नार्यास्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः’’ अर्थात् जहां नारियों की पूजा होती हे वहां देवताओं का वास होता है।
वेदों की रचना करने वाली भारतीय नारी थी, लक्ष्मीबाई, पद्मावती आदि नारियां भारत की थीं, अपनी अस्मिता को बचाने के लिए जौहर चिता सजाने वाली भी भारत की ही नारी थी। वह बुद्धिमान थी, प्राणवान थी, सहनशील थी, कभी बेचारी नहीं थीं। लेकिन कालान्तर में वह अपनी गरिमा खो चुकी हैं, उसका अवमूल्यन हो रहा है तथा उसे इस दुनिया में प्रवेश लेने के पहले ही दुनिया से विदाई दे दी जा रही है।
लिंगानुपात में भारी असंतुलन व कन्या भ्रूण हत्या मुख्य रूप से महिलाओं के प्रति लोगों की सोच, समाज के हर क्षेत्र में इनकी दयनीय स्थिति, सामाजिक असुरक्षा, दहेज व पारिवारिक परम्परा के कारण बढ़ता ही जा रहा है। प्रारम्भ से ही लड़कियों को पराया धन समझकर इनकी शैक्षिक, आर्थिक व सामाजिक स्थिति को कमजोर बनाया जाता रहा है। प्रारम्भ में तो यह परीक्षण गर्भस्थ शिशु के बारे में पूरी जानकारी प्राप्त कर लेने की उत्सुकता को रोक नहीं पाने के कारण कराया जाता रहा।
किन्तु शीघ्र ही उत्सुकता व ममता का स्थान बेटी को बेटे से हीन माननेवाली दुर्भावना ने लिया और ये परीक्षण ऐसी कुटिल, स्वार्थी व द्वेषपूर्ण भावना से कराए जाने लगे कि गर्भ में कहीं लड़के की बजाय लड़की ही तो नहीं है। कुछ दिनों पहले मुम्बई में ‘‘500 रुपये देकर 25 लाख रुपये (दहेज) बचाएं’’ जैसे होर्डिंग देखे गये। अर्थ यह है कि 500 रुपये में भ्रूण की जांच करा लें।