प्रकृति के साथ हमारा सहोदर भाव, सहअस्तित्व और सौमनस्यता का रिश्ता कमजोर होना जलवायु परिवर्तन की मुख्य वजह माना जा रहा है। औघोगिक विकास के गलाकाट आधुनिक युग में प्रकृति के बेरहम दोहन की प्रवृत्ति ने आज ऐसी परिस्थितियां कर दी हैं कि- जल ,जंगल, जमीन, वायु, अंतरिक्ष आकाश,जन और जानवर के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया।
मौसम की बेरुखी, वायुमंडल में बढ़ता तापमान और मौसम के बदलते मिज़ाज की वजह से कहीं अतिवृष्टि, तो कहीं अनावृष्टि, कहीं बाढ़, तो कहीं सूखा के रूप में हमारे सामने विकट परिस्थितियां पैदा हो गयी है।
भारत जैसे बहुसंख्यक आबादी वाले देश में पर्यावरण का नित बदलता रुख खाद्यान्न सुरक्षा के लिए भी खतरे का संकेत कर रहा है। ऐसे में यह बेहद जरूरी हो जाता है कि हम वेदोक्त परंपरा से अर्जित ज्ञान राशि का निरीक्षण-परीक्षण कर यह जानने-आजमाने की कोशिश करें कि मौजूदा पर्यावरणीय संकट का युगानुकूल समाधान हमारे शास्त्रीय परम्परा से निकलने की कोई संभावना है क्या?
पर्यावरण की परिभाषा को समझना जरूरी
भारतीय पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम,1986 में पर्यावरण की परिभाषा में कहा गया है कि "पर्यावरण में जल, वायु और भूमि तथा इनमें विघमान अन्तर्सम्बन्ध शामिल हैं, साथ ही इसमें जल, वायु और भूमि तथा मनुष्यों, अन्य जीवित प्राणी, पेड़-पौधे, सूक्ष्म जीव एवं गुणधर्म के बीच विघमान सम्बध भी आते हैं।
पर्यावरण का जो भी संकट आज दिख रहा है, उसके प्रति सबसे ज्यादा जवाबदेही विकास की उस अवधारणा की है, जिसके मुताबिक प्रकृति एक भोग्या सामग्री से ज्यादा कुछ नहीं है। प्रकृति से हमें सब कुछ मुफ्त में अंनत काल तक प्राप्त होता रहेगा। हम मनमाने तरीके से प्रकृति के शोषण-दोहन-दुरुपयोग करने के लिए स्वतंत्र हैं। प्रकृति से हम वह सब कुछ हासिल करने का जन्मजात अधिकार हैं, जिसे हम सिर्फ अपने सुख-सुविधा के लिए उपयोगी समझते हैं। भविष्य के लिए और भावी पीढ़ियों के लिए भी, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं है।
प्रकृति के प्रति हमारे बदलते व्यवहार की ओर इंगित करते हुए हिंदी के सुपरिचित कवि पंकज चतुर्वेदी की यह कविता जैसे विकास के मौजूदा मॉडल को चुनौती दे रही है-
चाहतें! कितनी छोटी हैं उनकी
वे चूस लेना चाहते हैं पेड़ों से हरापन
पहाड़ों से दृढ़ता
नदियों से प्रवाह
इनके बिना कैसी लगेगी दुनिया?
यही समय है कि हम प्रकृति के प्रति भौतिकवादी-भोगवादी नजरिए को छोड़कर नैतिकवादी रवैये को अपनावें। अथर्ववेद के "भूमि सूक्त" में मनुष्य और प्रकृति के नैतिक साहचर्य को बेहद खूबसूरती से संजोकर रखा गया है।
सत्यं बृहदृतमुग्रं दीक्षा तपों ब्रह्म यक्ष: पृथ्वी धारयन्ति।
सा नो भूतस्य भव्यस्य पत्नयुरु लोकं पृथ्वी कृणोतु-
शतपथ ब्राह्मण में वनस्पतियों को 'पशुपति 'कहा गया है, जो पर्यावरण को प्रदूषित करने वाले तत्व 'कार्बन डाइऑक्साइड' को भगवान शिव की तरह 'विषपान' कर जाते हैं। इसलिए यजुर्वेद में- वनानां पतये नमः। वृक्षणां पतये नमः। औषधीनां पतये नमः। की स्तुति हमारे वैदिक ऋषियों ने किया है।
पृथ्वी को भी इस वजह से साक्षात् माता कहा गया है- "विश्वस्वम् मातरमोषधीनाम्"
जिस प्रकार माता के दूध से नवजात शिशु को पोषण प्राप्त होता है, उसी प्रकार यह पृथ्वी अपने पुत्रों को बल और शक्ति प्रदान करती है। इसलिए वैदिक ऋषि पृथ्वी से निवेदन करते है कि- हे पृथ्वी! तुम्हारे शरीर से निकलने वाली शक्ति की धाराएं हैं, उनके साथ हमे संयुक्त करो-
यते मध्यं पृथ्वी यच्च नभ्यं यास्त ऊर्जस्तन्व: संबभूवुः।
तासु नो धेहि अभि नः पवस्य माता भूमि:sपुत्रोहं पृथ्वी व्या:।