लोग कहते थे- कहीं छोड़ आओ या मार दो, पर वो मेरे कलेजे का टुकड़ा था, ऐसा कैसे कर सकती थी तो सीने से लगाकर पाला। पढ़ें एक मां की दर्दभरी कहानी...
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दिव्यांग जगविंदर सिंह
जगविंदर जब पैदा हुआ तो उसके हाथ नहीं थे। उसे देखकर परिवार वालों ने ही कह दिया कि या तो इसे पिंगलवाड़ा छोड़ आओ या फिर मार दो। पर मां का कलेजा यह कैसे बर्दाश्त कर लेता। मैंने हिम्मत नहीं हारी। अपने पुत्तर को हर वो काम सिखाया, जो एक आम बच्चा कर सकता है। न खुद हार मानी और न कभी इसे हारना सिखाया। गरीबी के बावजूद उसे पढ़ने से लेकर किचन तक का काम सिखाया। आज मुझे अपने बेटे पर गर्व है।
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दिव्यांग साइकिलिस्ट जगविंद्र सिंह
अमर उजाला कार्यालय पहुंचीं पैरालंपिक साइकिलिस्ट जगविंदर सिंह की मां अमरजीत कौर ने अपने और अपने बेटे के संघर्ष की कहानी सुनाई तो सबकी आंखें भर आईं। मां अमरजीत कौर ने कहा कि दोनों हाथ न होने की वजह से जगविंदर को स्कूल में एडमिशन तक नहीं मिल रही थी। स्कूल में दाखिले के लिए उन्होंने काफी संघर्ष किया। वह रोज खुद जगविंदर को सुबह स्कूल छोड़ने और छुट्टी के समय वापस लेने जाती थीं।
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दिव्यांग साइकिलिस्ट जगविंद्र सिंह
पांचवीं कक्षा में जीत लिया था मेडल
जगविंदर सिंह ने बताया कि उन्होंने तीन साल की उम्र में पेंटिंग करनी शुरू कर दी थी और मात्र पांचवीं कक्षा में उन्होंने पेंटिंग में अवार्ड जीत लिया था। नौकरी के हर इंटरव्यू में पिता साथ जाते थे, ताकि उनके बेटे को कभी अकेला महसूस नहीं हो। जगविंदर पांच भाई बहनों में सबसे बड़े हैं।
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दिव्यांग साइकिलिस्ट जगविंद्र सिंह
मैंनू मेरे वीर ते माण है: राजविंदर कौर
खिलाड़ी जगविंदर सिंह की बहन राजविंदर कौर ने कहा कि मैंनू मेरे वीर ते माण है। अपने भाई को प्रेरणा समझने वाली राजविंदर ने कहा कि पैरा खिलाड़ियों को प्रोत्साहन की जरूरत होती है, आम खिलाड़ियों की तरह इन खिलाड़ियों को भी प्रोत्साहित करें। ये खिलाड़ी आम नहीं खास होते हैं।
पानी को बहते रहना चाहिए
कार्यक्रम के दौरान जगविंदर ने कहा कि पानी ठहर जाए तो वह खराब हो जाता है। मेरा मानना है कि पानी को चलते रहना चाहिए। मैं हमेशा चलते रहना चाहता हूं। मेरी जिंदगी को मैं चलते पानी की तरह हर छोर तक लेकर जाना चाहता हूं।