तस्वीरों में दिख रहा ये शख्स कभी लकड़ियां काटने का काम किया करता था। आज हर महीने 10 लाख रुपये कमाता है। खुद देख लिजिए आखिर कैसे।
विज्ञापन
2 of 6
ये शख्स काटता था लकड़ियां, आज कमाता है लाखों
ये है हरियाणा के कैथल जिले का रहने वाला एक मजदूर सतपाल। इसके प्रयासों से जिले का गोहरा गांव, अब शहद गांव के नाम से मशहूर हो चुका है। सतपाल ने 1996 में 5 डिब्बों से मधुमक्खी पालन शुरू किया था। शुरूआत में मधुमक्खियों ने काटा तो धंधा बंदकर करने की सोचने लगे थे पर रुके नहीं। खुद के पास जमीन नहीं थी तो दूसरों के खेतों की मेढ़ पर डिब्बे रखे। इससे गांव के किसानों की फसलों का उत्पादन भी बढ़ गया।
विज्ञापन
3 of 6
ये शख्स काटता था लकड़ियां, आज कमाता है लाखों
सतपाल कहते हैं कि मैंने और ईशान सिंह ने कृषि विज्ञान केंद्र कैथल से मधुमक्खी पालन को सबसे पहले सीखा था। आज तीन हजार आबादी वाले इस गांव में इन 20 सालों में सतपाल से करीब 100 से अधिक लोग जुड़ गए हैं। उनके पास 10 हजार डिब्बे हैं। हर माह 200 क्विंटल शहद सप्लाई करते हैं। हर महीने उन्हें करीब 10 लाख रुपए आमदनी भी होती है।
4 of 6
ये शख्स काटता था लकड़ियां, आज कमाता है लाखों
सतपाल बताते हैं कि आज गांव के खेतों में शहद के डिब्बे ही डिब्बे दिखते हैं। गांव का कोई भी व्यक्ति गलियों में खाली नहीं घूमता। आसपास के लोग और रिश्तेदार भी यहां से मधुमक्खी पालन सीख अपने गांवों में अपना रोजगार कर रहे हैं। ईशान सिंह बताते हैं कि वे मजदूरी करते थे। आज उनके पास 100 डिब्बे हैं। मधुमक्खी पालन से ही मैंने दो बेटियों को जीएनएम कराया।
विज्ञापन
5 of 6
ये शख्स काटता था लकड़ियां, आज कमाता है लाखों
ईशान सिंह बताते हैं कि आज उनकी बेटियां सरकारी नौकरी कर रही हैं। एक बेटा एमसीए व दूसरा सीए कर रहा है। गांव के किसान पहले मधुमक्खी पालन नहीं करते थे, पर जब देखा कि बिना जमीन वालों का काम बढ़ रहा है तो उन्होंने भी मधुमक्खी पालन शुरू कर दिया। अब करीब 15 किसान इस व्यवसाय से जुड़ चुके हैं। ब्रांडेड कंपनियों की गाड़ियां हर माह गांव आती हैं और शहद लोड कर ले जाती हैं।
गांव के ही एक किसान नरेश बताते हैं कि वे 8 साल से शहद उत्पादन कर रहे हैं, उनके पास 145 डिब्बे हैं। तीन लाख का शहद साल में बेच देते हैं। मैंने अपनी बेटी को 100 डिब्बे मधुमक्खी पालन के लिए दिए हैं। ग्राम प्रधान रेखा रानी कहती हैं कि इस व्यवसाय से गांव का काफी विकास हुआ है। जिनके पास कभी साइकिल तक नहीं होती थी। अब उनके पास बाइक व कारें हैं।'