वैलेंटाइन डे के मौके पर आपके सुनाते हैं, ओलंपियन पहलवान साक्षी मलिक की रोमांटिक लव स्टोरी। इन्हें प्यार भी एक पहलवान से हुआ और वो भी कुछ इस तरह।
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कितनी ग्लैमरस हो गई है ये ओलंपियन पहलवान
रियो ओलंपिक में देश को पहला मेडल दिलाने वाली पहलवान साक्षी मलिक की लव स्टोरी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। अभिनेता सलमान खान की फिल्म 'सुल्तान' की तरह इनकी लव स्टोरी शुरू हुई पहलवान सत्यवान के अखाड़े में। अखाड़े में कुश्ती सीखते-सीखते साक्षी कब अपने से छोटे पहलवान सत्यव्रत से प्यार कर बैठी पता ही नहीं चला।
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पहलवान साक्षी मलिक
23 साल के सत्यव्रत हरियाणा के रोहतक में अखाड़ा चलाने वाले पहलवान सत्यवान के बेटे हैं। सत्यवान को अर्जुन अवॉर्ड भी मिल चुका है। बताया जाता है कि पहलवान सत्यवान के अखाड़े में ही साक्षी और सत्यव्रत पहली बार एक दूसरे से मिले और दोनों के बीच प्यार हुआ। अभिभावकों की मंजूरी से शादी का फैसला ले लिया। सगाई हो चुकी है, अप्रैल में शादी है।
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ओलंपिक मेडल विजेता पहलवान साक्षी मलिक
रेलवे में बतौर टीई नियुक्त सत्यव्रत कादियान भी पहलवान हैं और देश को ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों में सिल्वर मेडल दिला चुके हैं। उनकी इस उपलब्धि के लिए उन्हें अर्जुन अवार्ड से नवाजा गया था। सत्यव्रत 97 किलो भारवर्ग में खेलते हैं। सत्यव्रत हरियाणा सरकार द्वारा आयोजित 1 करोड़ रुपये के इनामी दंगल में भी वे तीसरे स्थान पर रहे थे। पहलवान सत्यवान ही सत्यव्रत और साक्षी के गुरु हैं। सत्यवान को अर्जुन अवॉर्ड मिल चुका है।
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ओलंपिक मेडल विजेता पहलवान साक्षी मलिक
सत्यव्रत ने बताया कि साक्षी से उनकी मुलाकात ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान हुई थी। वहां भारतीय खिलाड़ी अच्छा प्रदर्शन कर रहे थे। मैंने और साक्षी दोनों ने सिल्वर मेडल जीता, लेकिन वो गोल्ड न जीत पाने के कारण निराश थी। एक पहलवान होने के नाते हमारी सामान्य जान पहचान थी, सो मैंने साक्षी को समझाया और कहा कि हर हार हमें कुछ सिखाती है, हमारी मंजिल राष्ट्रमंडल खेल नहीं ओलंपिक है। मेरी यह बात साक्षी के दिल को छू गई और वह उत्साह से भर गई।
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साक्षी मलिक और सत्यव्रत कादियान की अनोखी लव स्टोरी
सत्यव्रत ने बताया कि उसके बाद हम दोनों वहां से हंसते-खेलते खुशी-खुशी वहां से लौटे। लेकिन धीरे-धीरे सामान्य सी जान पहचान गहरी दोस्ती में बदल गई। फिर हम इंटरनेशनल चैंपियनशिप में साथ-साथ जाने लगे। एक दूसरे का साहस बढ़ाते और मेडल जीतते। इस तरह हमारी दोस्ती मजबूत होती गई और फिर हमने एक दूसरे का हमसफर बनने का निर्णय लिया। हम रियो में भी साथ होते, लेकिन महज एक सेकेंड से मैं चूक गया।
सत्यव्रत ने बताया कि साक्षी ओलिंपिक मेडल जीतने के बाद भी बहुत सहज और सरल है। वह हमेशा जमीन से जुड़ी रहती है। उसका नेचर दूसरों से बिलकुल अलग है। कुश्ती को लेकर उसमें गजब का समर्पण है। वह जो ठान लेती है करके रहती है। साक्षी का कहना है कि सत्यव्रत उनका खूब ख्याल रखते हैं और जिंदगी की हर कदम पर उनका हौसला बढ़ाते हैं। अब हमारा लक्ष्य अगले ओलंपिक में भी देश के लिए मेडल जीतना है।