जिंदगी की सबसे बड़ी खुशी और सबसे बड़ा गम मिला इस अभागन मां को। एक साथ चार बच्चों को जन्म देने के बावजूद अभागन रह गई ये मां।
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एक साथ 4 बच्चों को दिया जन्म फिर भी 'अभागन' रही मां
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एक महिला ने एक साथ चार बच्चों को जन्म दिया। इसके बावजूद उसे मां कहने वाला कोई नहीं। दरअसल जन्म होते ही सभी नवजात शिशुओं की मौत हो गई। यह दर्दनाक वाकया हरियाणा के पीजीआई रोहतक का है। परिजनों का आरोप है कि 4 में से 3 बच्चे पैदा होने के बाद जीवित थे। डॉक्टरों ने संभालने की बजाए उन्हें एक साथ कपडे़ में लपेट कर दे दिया जिनसे उनकी मौत हो गई।
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पीड़ित महिला के पति ने डॉक्टरों पर लापरवाही व अनदेखी का आरोप लगाते हुए 100 नंबर पर फोन कर पुलिस को शिकायत दी और कार्रवाई की मांग की है। देर शाम तक चले हंगामे की सूचना पर संस्थान के वरिष्ठ अधिकारी मौके पर पहुंचे और बताया कि बच्चों की मौत स्वाभाविक थी, इसमें डॉक्टरों की कोई लापरवाही नहीं है। पीड़ित ने अपनी शिकायत पीजीआई थाना में दी है।
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मंगलवार शाम करनाल के असंध से आई गीता ने एक साथ चार बच्चों को जन्म दिया। इसमें तीन लड़के और एक लड़की थे। महिला की मौसी संतोष व पति संजीव ने रोष जताते हुए बताया कि वे सोमवार रात करनाल से रेफर हो कर रात दस बजे आए थे। मंगलवार साढे़ चार बजे डिलीवरी हुई। डिलीवरी पर जच्चा को बताया गया कि उसके बच्चों का वजन 500-500 ग्राम है। उनका बचना संभव नहीं है वे लेकर क्या करेंगे। इसके बाद सभी बच्चों को डॉक्टर ने एक कपडे़ में लपेट कर दे दिया।
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आरोप के अनुसार न तो बच्चों को कोई उपचार दिया गया और न ही उनकी जांच की गई। संजीव ने रोष जताते हुए बताया कि डॉक्टरों का कार्य है मरीज के अंदर जान रहने तक उसको उपचार देना, लेकिन पीजीआई के डॉक्टर अपनी मर्यादा भूल चुके हैं। संजीव ने रोष जताते हुए बताया कि डिलीवरी के बाद गीता को वार्ड के बाहर निकाल दिया गया वह बाहर जमीन पर लेटी हुई थी। जब हंगामा हुआ तो उसे वार्ड में ले जाया गया।
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हंगामे के करीब दो घंटे बाद विभागाध्यक्ष डॉ. स्मिति नंदा, चिकित्सा अधीक्षक डॉ. अशोक चौहान, निदेशक डॉ. केबी गुप्ता, डॉ. आरबी जैन व सुरक्षा अधिकारी संजय सांगवान मौके पर पहुंचे। डॉ. अशोक चौहान ने आरोप निराधार बताते हुए कहा कि जच्चा के परिजनों को सारी स्थिति पहले ही बता दी गई थी। बच्चों की धड़कन नहीं थी। महिला को 25 सप्ताह की प्रेगनेंसी थी इसके चलते बच्चों का वजन 500 ग्राम के करीब था। महिला मर्जी से बाहर गई है, डॉक्टरों ने उसे नहीं निकाला है।
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वहीं डॉ. स्मिति नंदा, विभागाध्यक्ष, स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग ने बताया कि जच्चा-बच्चा की स्थिति के बारे में पहले ही परिजनों को बता दिया गया था। उनसे फाइल में इस संबंध में हस्ताक्षर भी लिए गए हैं। बच्चे मृत पैदा हुए हैं। उधर फोरेंसिक विभाग के डीएमएस डॉ. जितेंद्र जाखड़ का कहना है कि डीएमएस, भ्रूण को जीवित रहने के लिए कम से कम सात माह का समय पूरा होना चाहिए। इससे पहले के बच्चों का जीवित रहना मुश्किल होता है।