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Pics: 'वीरांगना' को सलाम, मुश्किलों को मात दे पाया मुकाम

Thu, 24 Sep 2015 07:54 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
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1965 के भारत-पाक युद्ध में पति 27 साल की उम्र में ही शहीद हो गए थे, लेकिन इन्होंने हिम्मत नहीं छोड़ी। मेहनत की और मुकाम हासिल किया। पढ़िए एक पत्नी की वीरता की कहानी।
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ये कहानी है शहीद लेफ्टिनेंट अजीत सिंह की पत्नी जसवंत जीत कौर की। पति युद्ध में शहीद हो गए थे। इसके बाद पत्नी ने अपने बल पर हालातों से जूझते हुए जिंदगी की नई कहानी गढ़ी और सीनियर ऑडिटर जैसे पद पर पहुंच होकर समाज को नारी शक्ति का आभास कराया। जसवंत के पति ले. अजीत सिंह 27 साल की उम्र में  वीर गति को प्राप्त हुए थे।
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जसवंत जीत कौर ने बताया कि असली जंग तो पति के शहीद होने के बाद शुरू हुई। उस समय बेटा सतप्रीत सिंह दो साल का था। ससुराल ने मुसीबत में साथ नहीं दिया। इसके बाद जिंदगी की जंग अपने दम पर जीतने की राह पकड़ ली। नौकरी के लिए कई जगह हाथ पैर मारे, लेकिन नहीं मिली। खूब धक्के खाने के बाद ऑडिटर की पोस्ट हासिल की। कई इंटर्नल एग्जाम देकर सीनियर ऑडिट ऑफिसर के पद तक पहुंचकर सेवानिवृत्त हुईं।

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जसवंत जीत कौर ने बताया कि जब वह शिमला में रहती तो बेटा अंगुली पकड़कर चलता था और बहुत सारे सवाल करता। थोड़ा बड़ा होने पर वह अकसर कहता कि जिन दुश्मनों ने पिता को मारा है मैं उन्हें मारूंगा। मैंने कई बार उसे समझाने की कोशिश की, लेकिन वह नहीं माना। अपने जुनून से आर्मी को ज्वाइन किया। सतप्रीत अपने पिता की बटालियन फॉर सिख में ही इन दिनों बठिंडा में बतौर कर्नल तैनात हैं।
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जसवंत कौर ने बताया कि अजीत 16 सैनिकों के साथ मोर्चा संभाले हुए था। तभी पाक के टैंकों ने उन्हें चारों तरफ से घेर लिया। सैनिक पीछे हटने लगे तो अजीत ने कहा कि गुरु गोबिंद सिंह के सिपाही होकर पीठ दिखाओगे, लड़ो। इसके बाद सैनिकों ने आगे बढ़कर हमला बोला। लेकिन अजीत के साथ सभी वीरगति को प्राप्त हुए।
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बता दें कि 1965 के युद्ध की गोल्डन जुबली पर जिला सैनिक बोर्ड ने वीर नारी जसवंत जीत कौर को उनके घर सम्‍मानित करने पहुंचे थे। बोर्ड के प्रेसिडेंट और डीसी डा. एसबी दीपक कुमार ने उन्हें शाल भेंट कर 15 हजार का चेक दिया। इस दौरान जसवंत ने अपनी जिंदगी ये कहानी साझा की।
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